गांधी का स्वराज स्थगन: “मैं खिलाफत के लिए स्वराज का प्रश्न भी स्थगित कर दूँगा” (107)
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भाग 107: महात्मा गांधी के शांति प्रयास | श्रृंखला अनुक्रमणिका
ब्लॉग 106 में सितंबर 1920 के कलकत्ता अधिवेशन में एनी बेसेंट की चेतावनी तथा एक वर्ष के भीतर सामने आए प्रलेखित परिणामों का उल्लेख किया गया था। यह लेख उसी अधिवेशन में गांधी द्वारा प्रस्तुत प्रलेखित उत्तर को सामने रखता है। यह उत्तर उन लोगों के लिए था जिन्होंने खिलाफत आंदोलन को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जोड़ने पर प्रश्न उठाए थे।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!सितंबर 1920 में गांधी का प्रलेखित कथन
गांधी का स्वराज स्थगन पाठक के सामने बिना किसी भूमिका के रखा गया है। सितंबर 1920 के कलकत्ता अधिवेशन में गांधी ने कहा:
“मैं खिलाफत के प्रश्न में सफलता प्राप्त करने के लिए स्वराज के प्रश्न को भी स्थगित कर दूँगा।”
इस कथन में प्राथमिकता प्राप्त विषय स्पष्ट रूप से खिलाफत का प्रश्न था। स्थगित किया जाने वाला विषय भी स्पष्ट था—स्वराज, अर्थात भारत का स्वशासन। 1885 में स्थापना से ही यही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य था। गांधी के कथन में यह भी स्पष्ट था कि खिलाफत आंदोलन की सफलता के लिए स्वराज को स्थगित किया जा सकता था।
यह श्रृंखला इस कथन का कोई अतिरिक्त अर्थ प्रस्तुत नहीं करती। केवल गांधी के प्रलेखित शब्द पाठकों के सामने रखे गए हैं, ताकि उनका मूल्यांकन पाठक स्वयं कर सकें।
यह कथन किस परिस्थिति में दिया गया
यह कथन उसी कलकत्ता अधिवेशन में दिया गया था जहाँ एनी बेसेंट तथा पाँच अन्य प्रलेखित असहमति रखने वाले नेताओं ने असहयोग और खिलाफत आंदोलन के संयुक्त कार्यक्रम का विरोध किया था। गांधी का यह उत्तर किसी निजी पत्र या अनौपचारिक टिप्पणी का भाग नहीं था। यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आधिकारिक अधिवेशन में दिया गया सार्वजनिक कथन था। उस समय कांग्रेस में गांधी के निर्विवाद अधिकार का भी प्रलेखित उल्लेख मिलता है।
ब्लॉग 102 से 106 में पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि खिलाफत आंदोलन पराजित विदेशी साम्राज्य की क्षेत्रीय सत्ता की पुनर्स्थापना से संबंधित था। यह भी बताया गया है कि ब्रिटिश शासन ने उसे धार्मिक संस्था के रूप में समाप्त नहीं किया था और 1924 में तुर्की ने स्वयं उसे समाप्त कर दिया। इसी पृष्ठभूमि में गांधी का स्वराज को स्थगित करने का यह प्रलेखित कथन प्रस्तुत किया गया है।
स्वराज क्या था — प्रलेखित तथ्य
स्वराज केवल एक विचार नहीं था। यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का स्पष्ट राजनीतिक उद्देश्य था। 1885 से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इसी उद्देश्य के लिए कार्य करती रही। अनेक प्रलेखित नेताओं ने इसी लक्ष्य के लिए संघर्ष किया, कारावास सहा और अपने प्राण न्योछावर किए। गांधी ने भी अपने अनेक कांग्रेस अभियानों में स्वराज को प्रमुख स्थान दिया था।
सितंबर 1920 के इस प्रलेखित कथन में गांधी ने स्वराज को खिलाफत प्रश्न के बाद रखा। यह श्रृंखला गांधी की निजी भावना पर कोई निष्कर्ष प्रस्तुत नहीं करती। यह केवल उनके सार्वजनिक कथन को सामने रखती है। कांग्रेस में गांधी के प्रलेखित अधिकार का विवरण 1920 के नागपुर अधिवेशन से लेकर 1946 में पटेल-नेहरू उत्तराधिकार तक ब्लॉग 91 में दिया गया है। इसी कारण सितंबर 1920 का यह कथन ऐतिहासिक महत्व रखता है।
यह कथन जिस प्रलेखित क्रम को पूर्ण करता है
इस श्रृंखला ने क्रमबद्ध रूप से इस कथन की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की है। ब्लॉग 102 में खिलाफत आंदोलन का स्वरूप बताया गया। ब्लॉग 103 में गांधी द्वारा प्रयुक्त “जीवन का अवसर” शब्दों का उल्लेख किया गया। ब्लॉग 104 में इस्लाम पर गांधी के अपने प्रलेखित कथनों का कालक्रम रखा गया। ब्लॉग 105 में बताया गया कि दोनों विषयों को जोड़ने के बाद कांग्रेस का स्वरूप कैसे बदला। ब्लॉग 106 में एनी बेसेंट की प्रलेखित चेतावनी और गांधी का उत्तर एक साथ प्रस्तुत किया गया।
यह ब्लॉग उसी उत्तर को स्वतंत्र प्रलेख के रूप में प्रस्तुत करता है। इसी समय गांधी ने एनी बेसेंट तथा पाँच अन्य असहमति रखने वाले नेताओं के उत्तर में कहा कि वे खिलाफत के लिए भारत के स्वराज को भी स्थगित कर सकते हैं।

अभियोजन का पक्ष
गांधी का स्वराज स्थगित करने का यह प्रलेख पाठक के सामने तीन प्रश्न रखता है।
- क्या सितंबर 1920 के कलकत्ता अधिवेशन में गांधी के अपने प्रलेखित कथन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुख्य उद्देश्य, अर्थात स्वराज, को खिलाफत आंदोलन से नीचे रखा?
- क्या ब्लॉग 102 से 106 में प्रस्तुत खिलाफत आंदोलन का प्रलेखित स्वरूप—एक पराजित विदेशी साम्राज्य की क्षेत्रीय सत्ता की पुनर्स्थापना की माँग—गांधी का स्वराज स्थगित करने की घोषणा के साथ देखा जाना चाहिए?
- क्या गांधी ने यह कथन कांग्रेस के आधिकारिक अधिवेशन में, अपने प्रलेखित निर्विवाद अधिकार के साथ, उन वरिष्ठ नेताओं के उत्तर में दिया जिन्होंने इस संयुक्त आंदोलन पर प्रश्न उठाए थे?
यह श्रृंखला इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देती। यह केवल गांधी के अपने प्रलेखित शब्द पाठकों के सामने रखती है। इसमें प्राथमिकता प्राप्त विषय, स्थगित किया गया विषय तथा रखी गई शर्त स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। आगे का विचार पाठक स्वयं करें।
प्रतिरक्षा पक्ष के लिए आमंत्रण
अब प्रतिरक्षा पक्ष का अवसर है। हम उन्हें अपने प्रलेख प्रस्तुत करने और अभियोजन द्वारा रखे गए विवरण को चुनौती देने के लिए आमंत्रित करते हैं।
सितंबर 1920, कलकत्ता। एनी बेसेंट और पाँच अन्य नेताओं ने असहमति प्रकट की। गांधी का प्रलेखित उत्तर था: “मैं खिलाफत के प्रश्न में सफलता प्राप्त करने के लिए स्वराज के प्रश्न को भी स्थगित कर दूँगा।” प्राथमिकता प्राप्त विषय था पराजित विदेशी साम्राज्य की क्षेत्रीय सत्ता की पुनर्स्थापना। स्थगित किया गया विषय था भारत का स्वराज, जो 1885 से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का घोषित उद्देश्य था। अभियोजन गांधी के अपने प्रलेखित शब्द पाठकों के सामने रखता है। आगे का निष्कर्ष पाठक स्वयं निकालें।
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शब्दावली
- गांधी का स्वराज स्थगन: इस ब्लॉग का प्रमुख पद। सितंबर 1920 के कलकत्ता अधिवेशन में गांधी द्वारा दिया गया वह प्रलेखित कथन, जिसमें उन्होंने खिलाफत आंदोलन की सफलता के लिए स्वराज को स्थगित करने की बात कही।
- स्वराज: भारत के स्वशासन अथवा स्वतंत्र शासन का लक्ष्य, जो 1885 से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का घोषित उद्देश्य था।
- खिलाफत आंदोलन: प्रथम विश्वयुद्ध के बाद उस्मानी खिलाफत की पुनर्स्थापना के समर्थन में चला अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन।
- कलकत्ता अधिवेशन (1920): सितंबर 1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन, जिसमें असहयोग और खिलाफत आंदोलन के संयुक्त कार्यक्रम पर निर्णय हुआ।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC): 1885 में स्थापित राजनीतिक संस्था, जिसने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया।
- असहयोग आंदोलन: गांधी के नेतृत्व में आरम्भ किया गया जनआंदोलन, जिसमें ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग समाप्त करने का आह्वान किया गया।
- एनी बेसेंट: कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और होम रूल आंदोलन की समर्थक, जिन्होंने खिलाफत और स्वाधीनता आंदोलन के विलय का विरोध किया।
- प्रलेखित प्रतिपक्ष: इस श्रृंखला में प्रयुक्त पद, जिसका अर्थ है किसी विषय पर गांधी का अभिलेखों में उपलब्ध सार्वजनिक उत्तर।
- प्रलेखित क्रम: इस श्रृंखला में विकसित किया गया क्रमबद्ध दस्तावेजी साक्ष्यों का अनुक्रम।
- प्रमुख प्रलेख: ऐसा मूल दस्तावेज या कथन जिसे बिना व्याख्या के सीधे पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जाए।
- अभियोजन का पक्ष: इस श्रृंखला की वह विश्लेषणात्मक पद्धति जिसमें दस्तावेजी साक्ष्य क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किए जाते हैं।
- प्रतिरक्षा पक्ष के लिए आमंत्रण: श्रृंखला का समापन भाग, जिसमें वैकल्पिक साक्ष्य और तर्क प्रस्तुत करने का आमंत्रण दिया जाता है।
- निर्विवाद अधिकार: कांग्रेस के भीतर गांधी के प्रलेखित प्रभाव और निर्णयकारी स्थिति का वर्णन करने वाला पद।
- क्षेत्रीय प्रभुसत्ता की पुनर्स्थापना: पराजित उस्मानी साम्राज्य के क्षेत्रों पर पुनः अधिकार स्थापित करने की माँग, जो खिलाफत आंदोलन का मुख्य उद्देश्य थी।
- मुख्य पद – गांधी का स्वराज स्थगन: इस ब्लॉग का केंद्रीय विषय, जो गांधी के प्रलेखित कथन के माध्यम से स्वराज और खिलाफत के संबंध की चर्चा करता है।
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Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)
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