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योग ईश्वर युक्तिसंगत सिद्धांत: प्राचीन तर्क और  आधुनिक निरीश्वरवादी समन्वय (योगसूत्र १.२४)

पतञ्जलि योगसूत्र — तर्कप्रधान अध्ययन

भारत /GB

योग ईश्वर युक्तिसंगत सिद्धांत जिसे अधिकांश निरीश्वरवादी नहीं देखते

आधुनिक निरीश्वरवाद ने चेतना को पदार्थ से उत्पन्न परिणाम बताया, उससे बहुत पहले पतञ्जलि इस विचार पर तर्कपूर्ण चर्चा कर चुके थे। उन्होंने आस्था, दैवी उद्घोषणा या दण्ड के भय पर नहीं, बल्कि शंका-समाधान की पद्धति पर बल दिया। पहले सबसे सशक्त आपत्ति रखी जाती है, फिर उसका समाधान तर्क से प्रस्तुत किया जाता है।

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भारतीय दर्शन पर होने वाली अनेक आधुनिक चर्चाएँ ईश्वर की संकल्पना को अब्राहमी धार्मिक परम्पराएँ के समान मान लेती हैं। पतञ्जलि का ईश्वर ऐसा नहीं है। योगसूत्र १.२४ में ईश्वर का प्रतिपादन चेतना की प्रकृति और मुक्ति की सम्भावना पर आधारित दार्शनिक विचार है। यह पदार्थवादी आपत्तियों पर विचार करता है।

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ २४ ॥

kleśa-karma-vipāka-āśayaiḥ aparāmṛṣṭaḥ puruṣa-viśeṣaḥ īśvaraḥ

“ईश्वर वह विशेष पुरुष-स्वरूप चेतना है जो क्लेश, कर्म, उनके फल और संस्कारों से सर्वथा अप्रभावित है।”

यहाँ सृष्टि की कथा, आदेश या उपासना का आग्रह नहीं है। यहाँ तर्क के आधार पर ईश्वर की परिभाषा दी गई है।

पतञ्जलि के ईश्वर की संकल्पना क्या नहीं है

योग में ईश्वर की चर्चा समझने के लिए पहले कुछ सामान्य धारणाएँ अलग करनी आवश्यक हैं।

पतञ्जलि के अनुसार ईश्वर शून्य से सृष्टि की रचना नहीं करते। सांख्य-योग परम्परा में प्रकृति ही जगत का भौतिक आधार मानी जाती है। ईश्वर किसी को पुरस्कार या दण्ड नहीं देते। इस प्रणाली में स्वर्ग, नरक या अंतिम न्याय का सिद्धान्त नहीं है। ईश्वर उपासना की अनिवार्यता भी नहीं रखते। योगसूत्र १.२३ में ईश्वर प्रणिधान अनेक मार्गों में से एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत है। ईश्वर चमत्कारों से नहीं, ज्ञान और धर्म के माध्यम से मार्गदर्शन करते हैं।

पतञ्जलि के अनुसार ईश्वर ऐसा विशेष पुरुष-स्वरूप चेतना है जो क्लेश, कर्म, उनके फल और संस्कारों से कभी बंधा नहीं। वह चेतना का अलग प्रकार नहीं, बल्कि सदैव मुक्त अवस्था में स्थित पुरुष है।

यदि कोई इस विचार की जाँच किए बिना इसे अस्वीकार करता है, तो वह केवल धार्मिक मत नहीं, बल्कि चेतना से जुड़े एक दार्शनिक प्रतिपादन की उपेक्षा करता है।


पतञ्जलि योगसूत्र व्याख्या शृंखला

पतञ्जलि के योगसूत्रों का क्रमबद्ध अध्ययन। इसमें प्रारम्भिक साधना, वृत्ति, समाधि तथा ईश्वर की संकल्पना का चरणबद्ध विवेचन प्रस्तुत है।

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जिस पदार्थवादी आपत्ति का उत्तर पतञ्जलि पहले ही दे चुके थे

सबसे प्रमुख निरीश्वरवादी प्रश्न यह है कि यदि मूल प्रकृति ही सबका आधार है, तो चेतना को अलग तत्त्व मानने की आवश्यकता क्यों है? यदि पदार्थ स्वयं तारों, ग्रहों, जीवों और मस्तिष्क का विकास कर सकता है, तो ईश्वर की कल्पना क्यों की जाए?

पतञ्जल योग प्रदीप में कहा गया है कि जड़ पदार्थ अपने आप उद्देश्यपूर्ण कार्य नहीं कर सकता। जैसे सारथि के बिना रथ नहीं चलता, वैसे ही केवल जड़ पदार्थ दिशा नहीं देता।

आधुनिक पदार्थवादी विकासवाद को इसका उत्तर मान सकते हैं। किन्तु पतञ्जलि का तर्क जैविक विकास तक सीमित नहीं है। उनका प्रश्न यह है कि यदि चेतना केवल पदार्थ का परिणाम है, तो सम्पूर्ण व्यवस्था चेतना की मुक्ति की ओर उन्मुख क्यों दिखाई देती है? सांख्य-योग के अनुसार प्रकृति का प्रयोजन भोग और अपवर्ग, दोनों है। ऐसा लक्ष्य, जिसे स्वयं पदार्थ अनुभव नहीं कर सकता, चेतन तत्त्व की आवश्यकता की ओर संकेत करता है।

यही योग ईश्वर युक्तिसंगत सिद्धांत है। इसका मुख्य प्रश्न सृष्टि की उत्पत्ति नहीं, बल्कि चेतना की मुक्ति की दिशा है।


वैदिक विज्ञान और दर्शन

जानिए कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्पराओं ने ब्रह्माण्ड, चेतना और विज्ञान से जुड़े अनेक विषयों पर कैसे विचार किया।

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चेतना की कठिन समस्या—लगभग तेईस शताब्दियाँ पहले

सन् १९९५ में डेविड चाल्मर्स ने “चेतना की कठिन समस्या” का प्रतिपादन किया। प्रश्न यह था कि व्यक्तिपरक अनुभव का अस्तित्व क्यों है। केवल सूचना-प्रक्रिया ही पर्याप्त क्यों नहीं है?

सांख्य-योग इस भेद को बहुत पहले स्वीकार कर चुका था। पुरुष केवल साक्षी है, वह कार्य नहीं करता। प्रकृति और मन कार्य करते हैं, पर अनुभव नहीं करते। मन विचार करता है, जबकि पुरुष उन विचारों का साक्षी होता है। यह प्रथम-पुरुष अनुभव और भौतिक वर्णन के बीच के भेद को स्पष्ट करता है।

योग ईश्वर युक्तिसंगत सिद्धांत इस विचार को आगे बढ़ाता है। यदि चेतना मूल तत्त्व है और केवल पदार्थ से उत्पन्न नहीं है, तो पूर्णतः अबद्ध चेतना की सम्भावना भी तर्कसंगत बनती है। पतञ्जलि के अनुसार यदि प्रत्येक पुरुष सदैव क्लेशों से बँधा हो, तो योग का लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकता। मुक्त योगी क्षणिक मुक्ति का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। ईश्वर उस चेतना का स्वरूप है जो कभी बन्धन में आई ही नहीं।


समाधि और उन्नत योग साधना

पतञ्जलि की क्रमबद्ध साधना-पद्धति के अनुसार सवितर्क से निर्बीज समाधि तक की अवस्थाओं का अध्ययन।

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ईश्वर के बिना योग दार्शनिक दृष्टि से अपूर्ण क्यों है

आधुनिक योग उद्योग ने योग की व्यापक दार्शनिक परम्परा से आसन और प्राणायाम को अलग कर उन्हें लौकिक स्वास्थ्य-पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया है। इससे शारीरिक लाभ अवश्य मिलता है, पर योग का मूल दार्शनिक आधार अधूरा रह जाता है।

पतञ्जलि के योगसूत्र १.२ में योग को चित्तवृत्ति निरोध कहा गया है। योगसूत्र १.२३ में सबसे सरल साधन ईश्वर प्रणिधान बताया गया है। योगसूत्र १.२४ यह स्पष्ट करता है कि यह मार्ग प्रभावी क्यों है। वहीं योग ईश्वर युक्तिसंगत सिद्धांत स्थापित किया गया है।

यदि योगसूत्रों से ईश्वर की संकल्पना हटा दी जाए, तो केवल लौकिक योग नहीं बचता। मुक्ति का सबसे सीधा मार्ग और उसका तर्कसंगत आधार भी समाप्त हो जाता है। तब योग केवल संस्कृत शब्दों के साथ शारीरिक व्यायाम बनकर रह जाता है।

एक बौद्धिक रूप से निष्पक्ष निरीश्वरवादी को ईश्वर स्वीकार करना आवश्यक नहीं है। किन्तु तर्क की जाँच किए बिना उसे अस्वीकार करना तर्कशीलता नहीं है। पतञ्जलि इसी प्रकार की बिना परीक्षण की अज्ञानता को अविद्या कहते हैं।


वृत्ति विश्लेषण शृंखला

समाधि को समझने से पहले मन की कार्यप्रणाली को समझना आवश्यक है। इस शृंखला में पाँचों वृत्तियों का क्रमबद्ध विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

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प्रतिपदार्थ उपमा: एकमात्र सर्वोच्च सत्ता का तर्क

भाष्य में एक प्रश्न उठाया गया है। क्या अनेक ईश्वर हो सकते हैं? इसका उत्तर तर्क के आधार पर दिया गया है। यदि दो सर्वोच्च चेतनाएँ परस्पर विपरीत संकल्प रखें, तो एक सृष्टि चाहे और दूसरी विलय, तब कोई भी व्यवस्था स्थिर नहीं रह सकती।

यह विचार आधुनिक ब्रह्माण्ड विज्ञान के एक प्रश्न की स्मृति कराता है। यदि पदार्थ और प्रतिपदार्थ पूर्ण संतुलन में होते, तो दोनों एक-दूसरे को नष्ट कर देते। सूक्ष्म असमानता के कारण पदार्थ बचा रहा। उसी प्रकार यदि अनेक सर्वोच्च चेतनाओं की इच्छाएँ भिन्न हों, तो व्यवस्था बाधित हो जाएगी। इसलिए तर्क एक अद्वितीय सर्वोच्च चेतना की ओर संकेत करता है।

यदि अनेक में कोई एक अन्य से श्रेष्ठ माना जाए, तो अन्ततः वही सर्वोच्च माना जाएगा। इस प्रकार विचार एकमात्र सर्वोच्च सत्ता पर आकर ठहरता है। श्वेताश्वतर उपनिषद् भी कहता है कि उसके समान या उससे बढ़कर कोई नहीं है। ज्ञान, शक्ति और क्रिया उसी का स्वभाव हैं।

यह रहस्य का आग्रह नहीं, बल्कि तर्क का निष्कर्ष है।


अभ्यास और वैराग्य शृंखला

निरन्तर अभ्यास और क्रमशः बढ़ता वैराग्य योग साधना के दो आधार हैं। इन्हीं पर आगे की सभी साधनाएँ निर्मित होती हैं।

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निष्पक्ष निरीश्वरवादी के सामने तीन प्रश्न

योग ईश्वर युक्तिसंगत सिद्धांत किसी निरीश्वरवादी से आस्था की अपेक्षा नहीं करता। वह केवल तीन प्रश्नों पर विचार करने का आग्रह करता है।

पहला: क्या चेतना को केवल पदार्थ से समझाया जा सकता है? यदि हाँ, तो व्यक्तिपरक अनुभव का अस्तित्व कैसे समझाया जाएगा? यदि नहीं, तो अभौतिक चेतना की सम्भावना स्वीकार करनी होगी।

दूसरा: यदि अभौतिक चेतना सम्भव है, तो क्या वह पूर्णतः अबद्ध हो सकती है? यदि मानसिक क्लेशों से मुक्ति सम्भव है, तो स्थायी रूप से मुक्त चेतना भी तर्कसंगत सम्भावना बनती है।

तीसरा: यदि वास्तविकता में बन्धन से मुक्ति तक का मार्ग विद्यमान है, तो उसकी संरचना का आधार क्या है? केवल जड़ पदार्थ अपने अतिक्रमण का क्रमबद्ध मार्ग नहीं बनाता। पतञ्जलि का उत्तर है कि जो चेतना कभी बन्धन में नहीं आई, वही इस सम्भावना का आधार है।

इन उत्तरों से असहमति सम्भव है। किन्तु तर्क की जाँच के बाद असहमति दर्शन है। बिना विचार किए अस्वीकार करना वही अविद्या है जिसे पतञ्जलि मूल क्लेश मानते हैं।

योग ईश्वर युक्तिसंगत सिद्धांत लगभग तेईस शताब्दियों से गम्भीर पदार्थवादी विमर्श की प्रतीक्षा कर रहा है। प्रश्न यह है कि क्या आधुनिक नव-निरीश्वरवादी विचारधारा इस तर्क का निष्पक्ष परीक्षण करेगा, या बिना परीक्षण उसे अस्वीकार करता रहेगा।


योग की आधारभूत शृंखला

उन्नत विषयों को समझने से पहले मूल सिद्धान्तों को समझना आवश्यक है। यह शृंखला “अथ” से लेकर चित्तवृत्ति निरोध तक की आधारभूत अवधारणाओं का परिचय देती है।

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सन्दर्भ

  • मुख्य स्रोत: स्वामी ओमानन्द कृत पतञ्जल योग प्रदीप (गीता प्रेस), योगसूत्र १.२४ की व्याख्या (पृष्ठ १९८–२०२)
  • शास्त्रीय सन्दर्भ: योगसूत्र १.२४ (पतञ्जलि), श्वेताश्वतर उपनिषद् ६.८, सांख्यकारिका
  • आधुनिक सन्दर्भ: डेविड चाल्मर्स, “Facing Up to the Problem of Consciousness” (१९९५); महाविस्फोट के पश्चात पदार्थ-प्रतिपदार्थ असमानता पर आधारित मानक ब्रह्माण्डीय प्रतिमान
  • शृंखला सन्दर्भ: हिन्दूइन्फोपीडिया की पतञ्जलि योगसूत्र व्याख्या शृंखला — तर्कप्रधान अध्ययन

मुख्य चित्र: चित्र देखने के लिए यहां क्लिक करें।

वीडियो

शब्दावली

  1. योग ईश्वर युक्तिसंगत सिद्धांत: इस लेख का प्रमुख वाक्यांश। योगदर्शन में ईश्वर के अस्तित्व और आवश्यकता का तर्काधारित दार्शनिक प्रतिपादन।
  2. पतञ्जलि: योगसूत्रों के रचयिता, जिन्होंने योगदर्शन को सूत्ररूप में व्यवस्थित किया।
  3. योगसूत्र: महर्षि पतञ्जलि द्वारा रचित योगदर्शन का मूल ग्रन्थ।
  4. पुरुष: सांख्य-योग दर्शन में शुद्ध, चेतन, साक्षी तत्त्व।
  5. प्रकृति: जड़ मूल तत्त्व, जिससे समस्त भौतिक जगत की अभिव्यक्ति होती है।
  6. क्लेश: अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश जैसे मानसिक बन्धनों का समूह।
  7. अपवर्ग: जन्म-मरण और दुःख के चक्र से पूर्ण मुक्ति।
  8. ईश्वर प्रणिधान: ईश्वर के प्रति समर्पित चित्त द्वारा साधना का विशेष योगमार्ग।
  9. अविद्या: वास्तविक स्वरूप का अज्ञान; योगदर्शन में समस्त क्लेशों का मूल कारण।
  10. चेतना की कठिन समस्या: यह दार्शनिक प्रश्न कि व्यक्तिपरक अनुभव केवल भौतिक प्रक्रियाओं से कैसे उत्पन्न होता है।
  11. प्रतिपदार्थ: पदार्थ का विपरीत स्वरूप, जो समान सम्पर्क में आने पर विनाशकारी अभिक्रिया करता है।
  12. निरीश्वरवाद: वह दार्शनिक मत जो ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता।
  13. सांख्य-योग दर्शन: भारतीय दार्शनिक परम्परा जिसमें पुरुष और प्रकृति के भेद पर मुक्ति का सिद्धांत आधारित है।
  14. वृत्ति: चित्त की विभिन्न मानसिक अवस्थाएँ या परिवर्तन।
  15. समाधि: योग की सर्वोच्च अवस्था जिसमें चित्त पूर्णतः स्थिर होकर आत्मस्वरूप में स्थित होता है.

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