A striking split-contrast vintage graphic illustrating the intense historical friction between the heavy human costs of unrest and the uncompromising pursuit of absolute national unity and peace.A striking split-contrast vintage graphic illustrating the intense historical friction between the heavy human costs of unrest and the uncompromising pursuit of absolute national unity and peace.

गांधी की जीवन से महत्वपूर्ण एकता: हिंदुओं की मृत्यु पर गांधी का दृष्टिकोण (118)

भारत / GB

भाग 118: महात्मा गांधी के शांति प्रयास | श्रृंखला अनुक्रम

ब्लॉग 117 में मोपला घटनाओं के कर्ताओं पर गांधी के अभिलेखित शब्द पाठकों के सामने रखे गए थे— “ईश्वर से डरने वाले”, “साहसी”, “पराक्रम।” यह लेख उसी क्रम का एक दूसरा अभिलेखित उदाहरण प्रस्तुत करता है— एक प्रसिद्ध हिन्दू नेता, एक प्रसिद्ध मुस्लिम हत्यारा, और दोनों के प्रति गांधी की अपनी अभिलेखित भाषा।

Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

अभिलेखित क्रम— पूरी श्रृंखला में स्थापित

गांधी की जीवन से महत्वपूर्ण एकता इस लेख की शुरुआत में एक अभिलेखित क्रम प्रस्तुत करती है। सन 1921 के मोपला विद्रोह के दौरान गांधी ने कर्ताओं के लिए “ईश्वर से डरने वाले”, “साहसी”, “पराक्रम”, “कुछ मोपला” और “इस्लाम तथा स्वराज की भटकी हुई सेवा” जैसे शब्द लिखे। चार महीने तक चली हत्याओं, बलपूर्वक मत परिवर्तन और मंदिरों के अपमान के पीड़ित हिन्दुओं का गांधी के अभिलेखित कथनों में उसी प्रकार स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। इसलिए यह लेख एक प्रश्न रखता है— क्या मोपला घटना अकेला उदाहरण थी, या किसी व्यापक क्रम का भाग?

तेईस दिसंबर उन्नीस सौ छब्बीस का एक अभिलेखित प्रसंग इसी प्रश्न की अगली कड़ी प्रस्तुत करता है।

स्वामी श्रद्धानंद— अभिलेखित पीड़ित

गांधी की जीवन से महत्वपूर्ण एकता स्वामी श्रद्धानंद का अभिलेखित परिचय प्रस्तुत करती है। उनका जन्म सन 1856 में मुंशी राम के रूप में हुआ। वे आर्य समाज के संन्यासी और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यकर्ता थे। उन्होंने असहयोग आंदोलन में गांधी के साथ कार्य किया था। सन 1919 में उन्होंने दिल्ली की जामा मस्जिद में खड़े होकर भाषण दिया था। यह उस समय हिन्दू-मुस्लिम सहयोग का एक अभिलेखित प्रसंग था, जिसका उल्लेख और स्वागत गांधी ने स्वयं किया था। गांधी स्वामी श्रद्धानंद को व्यक्तिगत रूप से जानते थे।

गांधी ने अपने यंग इंडिया के तीस दिसंबर उन्नीस सौ छब्बीस के लेख (सीडब्ल्यूएमजी, खंड बत्तीस, पृष्ठ 457) में लिखा कि स्वामीजी ने कुछ महीने पहले उन्हें बताया था कि उन्हें जीवन समाप्त करने की धमकी वाले पत्र मिलते रहते हैं।

अर्थात गांधी को इस चेतावनी की जानकारी पहले से थी।

तेईस दिसंबर उन्नीस सौ छब्बीस को, जब स्वामी श्रद्धानंद अस्वस्थ होकर बिस्तर पर थे, तब अब्दुल रशीद उनके कक्ष में पहुँचा और उन्हें गोली मारकर उनकी जीवनलीला समाप्त कर दी।

गुवाहाटी कांग्रेस अधिवेशन में गांधी की अभिलेखित प्रतिक्रिया

गांधी की जीवन से महत्वपूर्ण एकता गांधी की अपनी अभिलेखित प्रतिक्रिया प्रस्तुत करती है। यह घटना उस समय हुई जब गांधी गुवाहाटी कांग्रेस अधिवेशन जा रहे थे। वहाँ उन्होंने स्वामी श्रद्धानंद को श्रद्धांजलि दी तथा उन्हें बलिदानी और समाज सुधारक कहा। यह अभिलेखों में उपलब्ध है।

उसी भाषण में गांधी ने (सीडब्ल्यूएमजी, खंड बत्तीस, पृष्ठ 461-462) कहा:

“अब आप शायद समझेंगे कि मैंने अब्दुल रशीद को अपना भाई क्यों कहा है। मैं यह फिर कहता हूँ। मैं उसे स्वामीजी की हत्या का दोषी भी नहीं मानता। दोषी तो वे सभी हैं जिन्होंने एक-दूसरे के प्रति घृणा की भावना उत्पन्न की।”

यहाँ गांधी के अपने अभिलेखित शब्द प्रस्तुत किए गए हैं। उन्होंने अब्दुल रशीद को अपना भाई कहा। उन्होंने यह भी दोहराया कि वे उसे हत्या का दोषी नहीं मानते। उनके अनुसार दोष उन लोगों का था जिन्होंने समाज में परस्पर घृणा का वातावरण बनाया।

तीस दिसंबर उन्नीस सौ छब्बीस के यंग इंडिया लेख (सीडब्ल्यूएमजी, खंड बत्तीस, पृष्ठ 457) में भी गांधी ने लिखा कि शिक्षित और अर्धशिक्षित वर्ग उस उग्र वातावरण के लिए उत्तरदायी था जिसने अब्दुल रशीद को प्रभावित किया।

दोनों घटनाओं का अभिलेखित समान क्रम

गांधी की जीवन से महत्वपूर्ण एकता इन दोनों घटनाओं के बीच दिखाई देने वाले अभिलेखित क्रम को सामने रखती है।

मोपला, सन 1921 में हत्याएँ, बलपूर्वक मत परिवर्तन और मंदिरों का अपमान हुआ। गांधी ने कर्ताओं के लिए “ईश्वर से डरने वाले”, “साहसी” और “पराक्रम” जैसे शब्द लिखे। उन्होंने घटना को “कुछ मोपला” तक सीमित बताया।

श्रद्धानंद, सन 1926 में गांधी के परिचित एक प्रसिद्ध हिन्दू नेता की एक प्रसिद्ध मुस्लिम व्यक्ति द्वारा हत्या हुई। गांधी ने उस व्यक्ति को “मेरा भाई” कहा। उन्होंने यह भी कहा कि वे उसे हत्या का दोषी नहीं मानते।

यह लेख किसी अतिरिक्त टिप्पणी के बिना दोनों घटनाओं को साथ रखता है। दोनों प्रसंगों में हिन्दू पीड़ितों को ऐसे दृष्टिकोण में रखा गया जहाँ दोष किसी अन्य दिशा में निर्धारित किया गया। दोनों प्रसंगों में गांधी ने संबंधित मुस्लिम व्यक्तियों के लिए निकट संबंध और सहानुभूति दर्शाने वाली भाषा का प्रयोग किया।

सन 1946 की तीसरी अभिलेखित परत— डायरेक्ट एक्शन डे और बिहार

गांधी की जीवन से महत्वपूर्ण एकता लगभग बीस वर्ष बाद का एक तीसरा अभिलेखित उदाहरण प्रस्तुत करती है।

सोलह अगस्त उन्नीस सौ छियालिस को मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन आह्वान के बाद कलकत्ता में चार दिनों तक व्यापक हिंसा हुई। विभिन्न स्रोतों में मृत्यु संख्या चार हजार से दस हजार तक बताई गई है। घटना और उसका मुस्लिम लीग के आह्वान से संबंध अभिलेखों में दर्ज है।

उस समय गांधी सेवाग्राम आश्रम में थे। उनकी अभिलेखित प्रतिक्रिया यह थी कि उन्होंने इसे “निरर्थक हिंसा” कहा, जिसने ब्रिटिश शासन को लंबा किया। उन्होंने उपवास नहीं रखा। उन्होंने उपवास की चेतावनी भी नहीं दी। मुस्लिम लीग से अपना आह्वान वापस लेने का कोई प्रलेखित आग्रह भी नहीं किया।

सत्रह से उन्नीस अगस्त उन्नीस सौ छियालिस के बीच हिन्दुओं की प्रतिकारात्मक प्रतिक्रिया आरंभ हुई। उन्नीस अगस्त को गांधी ने लिखा, “वे प्रतिकार कर सकते हैं या उससे दूर रह सकते हैं। उससे दूर रहना सरल है, यदि इच्छा हो। प्रतिकार कठिन है।” एक प्रार्थना सभा में उन्होंने यह भी कहा कि समाज को केवल कर्म से ही नहीं, बल्कि विचारों में भी प्रतिकार की प्रवृत्ति का त्याग करना चाहिए। (सीडब्ल्यूएमजी, खंड अट्ठानवे)

अक्टूबर और नवंबर उन्नीस सौ छियालिस में बिहार में दंगे हुए। कलकत्ता और नोआखाली की घटनाओं के प्रतिकार में कुछ हिन्दू समूहों ने मुसलमानों पर आक्रमण किए। गांधी ने प्रलेखित रूप से कहा कि यदि चौबीस घंटे के भीतर यह हिंसा नहीं रुकी तो वे आमरण उपवास करेंगे। कांग्रेस नेता राजेंद्र प्रसाद ने इस चेतावनी का राष्ट्रीय प्रसारण कराया।

यह लेख उन्नीस सौ छियालिस की इन तीनों प्रलेखित प्रतिक्रियाओं को उन्नीस सौ इक्कीस और उन्नीस सौ छब्बीस की घटनाओं के साथ क्रमवार प्रस्तुत करता है। डायरेक्ट एक्शन डे की हिंसा को गांधी ने “निरर्थक हिंसा” कहा। हिन्दू प्रतिकार के विषय में उन्होंने कहा, “प्रतिकार कठिन है” और प्रतिकार की प्रवृत्ति त्यागने का आग्रह किया। बिहार में मुसलमानों के विरुद्ध हुई हिन्दू हिंसा पर उन्होंने चौबीस घंटे के भीतर आमरण उपवास की चेतावनी दी। यह लेख इन घटनाओं में गांधी की प्रलेखित भाषा और अपनाए गए साधनों को बिना अतिरिक्त टिप्पणी के पाठकों के सामने रखता है।

सावरकर ने क्या प्रलेखित किया

गांधी की जीवन से महत्वपूर्ण एकता एक और प्रलेखित टिप्पणी प्रस्तुत करती है। सोलह नवंबर उन्नीस सौ उनतीस के श्रद्धानंद पत्र में सावरकर ने प्रश्न उठाया कि जिस प्रकार गांधी ने अब्दुल रशीद को “मेरा भाई” कहा, उसी प्रकार वे भारतभर में सम्मानित हिन्दू स्वतंत्रता सेनानी जतीन को “बलिदानी जतीन”, “वीर जतीन” या कम से कम “भाई जतीन” क्यों नहीं कह सके। सावरकर ने हिन्दू बलिदानियों और मुस्लिम आक्रमणकारियों के प्रति इस भिन्न व्यवहार का उल्लेख उसी समय प्रलेखित किया था। यह बाद के इतिहासकारों का निष्कर्ष नहीं था।


Gandhi's Moplah Verdict

गांधी का मोपला निर्णय
मोपला आक्रमणकारियों के लिए गांधी द्वारा प्रयुक्त प्रलेखित शब्द— “ईश्वर-भय रखने वाले”, “साहसी”, “पराक्रम”— तथा पीड़ितों के प्रति उनके मौन का तुलनात्मक अध्ययन।

विश्लेषण पढ़ें →

अभियोजन का पक्ष

गांधी की जीवन से महत्वपूर्ण एकता पाठकों के सामने तीन प्रश्न रखती है।

  • क्या गुवाहाटी कांग्रेस अधिवेशन, उन्नीस सौ छब्बीस में गांधी के अपने प्रलेखित शब्द— “मैंने अब्दुल रशीद को अपना भाई कहा है और मैं इसे फिर दोहराता हूं। मैं स्वामीजी की हत्या के लिए उसे भी दोषी नहीं मानता।” (सीडब्ल्यूएमजी, खंड बत्तीस, पृष्ठ चार सौ इकसठ से चार सौ बासठ)— उस व्यक्ति के प्रति गांधी की प्रलेखित भाषा का मूल स्रोत हैं जिसने गांधी के परिचित एक नामित हिन्दू नेता की हत्या की?
  • क्या तीस दिसंबर उन्नीस सौ छब्बीस के यंग इंडिया लेख में गांधी ने हत्या का उत्तरदायित्व शिक्षित और अर्धशिक्षित वर्ग पर रखा, जिसने अब्दुल रशीद को प्रभावित करने वाला उग्र वातावरण बनाया? क्या यही स्वरूप उन्होंने उन्नीस सौ इक्कीस के मोपला विद्रोह के वर्णन में भी अपनाया था?
  • क्या तीन प्रलेखित घटनाओं में दिखाई देने वाला यह क्रम— उन्नीस सौ इक्कीस में “ईश्वर-भय रखने वाले” मोपला, उन्नीस सौ छब्बीस में “मेरा भाई” अब्दुल रशीद, और उन्नीस सौ छियालिस में डायरेक्ट एक्शन डे के लिए “निरर्थक हिंसा”, हिन्दू प्रतिकार के लिए “प्रतिकार कठिन है” तथा बिहार की हिंसा पर आमरण उपवास की चेतावनी— गांधी द्वारा हिन्दू-मुस्लिम एकता को सर्वोच्च रखने वाले एक निरंतर प्रलेखित दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है?

यह श्रृंखला इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देती। गांधी की जीवन से महत्वपूर्ण एकता केवल नामित पीड़ित, नामित हत्यारे और दोनों के प्रति गांधी की अपनी प्रलेखित भाषा को सत्यापित मूल स्रोतों के आधार पर प्रस्तुत करती है। पाठक स्वयं देखेंगे कि गांधी ने श्रद्धानंद को बलिदानी, समाज सुधारक और कर्मवीर कहा, जबकि उनके हत्यारे को “भाई” और “दोषी नहीं” कहा। अंतिम निर्णय पाठक स्वयं करेंगे।

प्रतिरक्षा पक्ष के लिए आमंत्रण

अब मंच प्रतिरक्षा पक्ष का है। हम उन्हें आमंत्रित करते हैं कि वे अपने प्रमाण प्रस्तुत करें और अभियोजन द्वारा प्रस्तुत विवरण को चुनौती दें।

मोपला, उन्नीस सौ इक्कीस: “ईश्वर-भय रखने वाले।” “साहसी।” “पराक्रम।” श्रद्धानंद, उन्नीस सौ छब्बीस: “मेरा भाई अब्दुल रशीद। मैं उसे भी दोषी नहीं मानता।” (सीडब्ल्यूएमजी, खंड बत्तीस, पृष्ठ चार सौ इकसठ से चार सौ बासठ)। डायरेक्ट एक्शन डे, अगस्त उन्नीस सौ छियालिस: “निरर्थक हिंसा जिसने ब्रिटिश शासन को लंबा किया।” हिन्दू प्रतिकार, अगस्त उन्नीस सौ छियालिस: “दूर रहना सरल है। प्रतिकार कठिन है।” बिहार, अक्टूबर उन्नीस सौ छियालिस: मुसलमानों के विरुद्ध हिन्दू हिंसा पर चौबीस घंटे के भीतर आमरण उपवास की चेतावनी। यह लेख प्रत्येक प्रलेखित घटना में गांधी की प्रलेखित भाषा और अपनाए गए साधनों को क्रमवार प्रस्तुत करता है। अंतिम निष्कर्ष पाठक स्वयं निकालेंगे।

मुख्य चित्र: चित्र देखने के लिए यहां क्लिक करें।

वीडियो

शब्दावली

  1. गांधी की जीवन से महत्वपूर्ण एकता: इस श्रृंखला का प्रमुख वाक्यांश, जो गांधी के प्रलेखित कथनों के आधार पर उस निरंतर स्वरूप को दर्शाता है जिसमें हिन्दू-मुस्लिम एकता को हिन्दुओं की मृत्यु से ऊपर रखा गया बताया गया है।
  2. प्रलेखित स्वरूप: इस श्रृंखला में प्रयुक्त विशेष वाक्यांश, जिसका अर्थ है विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं में उपलब्ध प्रमाणित अभिलेखों से दिखाई देने वाला समान क्रम।
  3. प्रलेखित भाषा: गांधी द्वारा अपने भाषणों, लेखों और पत्रों में प्रयुक्त मूल शब्दावली, जिसे प्राथमिक स्रोतों से उद्धृत किया गया है।
  4. मोपला विद्रोह: सन उन्नीस सौ इक्कीस में मालाबार क्षेत्र में हुआ विद्रोह, जिसमें व्यापक हिंसा, बलपूर्वक मत परिवर्तन और मंदिरों के अपमान की घटनाएँ दर्ज हैं।
  5. स्वामी श्रद्धानंद: आर्य समाज के संन्यासी, समाज सुधारक और स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यकर्ता, जिनकी तेईस दिसंबर उन्नीस सौ छब्बीस को हत्या कर दी गई।
  6. अब्दुल रशीद: स्वामी श्रद्धानंद की हत्या करने वाला व्यक्ति, जिसे गांधी ने अपने प्रलेखित वक्तव्य में “मेरा भाई” कहा।
  7. सीडब्ल्यूएमजी (Collected Works of Mahatma Gandhi): महात्मा गांधी के भाषणों, लेखों, पत्रों और वक्तव्यों का आधिकारिक संकलन, जिसे इस लेख में प्राथमिक स्रोत के रूप में उद्धृत किया गया है।
  8. यंग इंडिया: गांधी द्वारा संपादित अंग्रेज़ी साप्ताहिक पत्र, जिसमें उनके अनेक विचार और सार्वजनिक वक्तव्य प्रकाशित हुए।
  9. डायरेक्ट एक्शन डे: मुस्लिम लीग द्वारा सोलह अगस्त उन्नीस सौ छियालिस को दिया गया आह्वान, जिसके बाद कलकत्ता में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई।
  10. सेवाग्राम आश्रम: वर्धा स्थित गांधी का आश्रम, जहाँ से उन्होंने अनेक ऐतिहासिक घटनाओं पर सार्वजनिक प्रतिक्रियाएँ दीं।
  11. गुवाहाटी कांग्रेस अधिवेशन: उन्नीस सौ छब्बीस का कांग्रेस अधिवेशन, जहाँ गांधी ने स्वामी श्रद्धानंद की हत्या पर अपना प्रलेखित वक्तव्य दिया।
  12. श्रद्धानंद पत्र: सावरकर द्वारा प्रकाशित पत्र, जिसमें गांधी के अब्दुल रशीद संबंधी कथन पर प्रश्न उठाए गए।
  13. अभियोजन का पक्ष: इस ब्लॉग श्रृंखला की प्रस्तुति शैली, जिसमें ऐतिहासिक प्रमाण क्रमवार रखे जाते हैं और निर्णय पाठकों पर छोड़ा जाता है।
  14. प्राथमिक स्रोत: घटना के समय के मूल दस्तावेज़, भाषण, लेख या अभिलेख, जिन पर ऐतिहासिक विश्लेषण आधारित होता है।
  15. नामित पीड़ित और नामित हत्यारा: इस श्रृंखला का प्रमुख वाक्यांश, जिसका आशय है कि घटना के दोनों पक्षों की पहचान मूल अभिलेखों के आधार पर स्पष्ट रूप से प्रस्तुत की गई है।

#गांधी #महात्मा_गांधी #इतिहास #भारत #कांग्रेस #मोपला #श्रद्धानंद #सावरकर #डायरेक्टएक्शन #विभाजन #राजनीति #HinduinfoPedia

Scan Through The Entire Series at

Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)

Refer to Various Arks Referred to in the Blog

Gandhi Prosecution Exhibits Master Table

Follow us:

[Short URL https://hinduinfopedia.in/?p=28980]