गांधी के जिन्ना और चौदह सूत्र — चौदह रक्षात्मक प्रावधानों की संकेतक भाषा (81)
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भाग 81: महात्मा गांधी के शांति प्रयास | श्रृंखला सूचकांक
ब्लॉग 80 में उस दंगा-श्रृंखला का विवरण दिया गया था जिसे गांधी के खिलाफत प्रयोग ने पीछे छोड़ दिया था। खिलाफत के अंत के बाद तीन वर्षों में 72 दंगे हुए। यह लेख देखता है कि 1929 में जिन्ना ने क्या किया और उनके चौदह सूत्रों की संकेतक भाषा को पाठकों के सामने रखता है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!पृष्ठभूमि — आठ वर्षों का क्रम
मार्च 1929 में जिन्ना ने दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के अधिवेशन में अपने चौदह सूत्र प्रस्तुत किए।
उस समय तक दंगों की दर्ज श्रृंखला आठ वर्षों से चल रही थी। इस श्रृंखला ने ब्लॉग 80 में मोपला 1921, कोहाट 1924, कलकत्ता 1926, लाहौर 1927 और बंबई 1929 की घटनाओं का उल्लेख किया है। खिलाफत प्रयोग के माध्यम से बनी संगठित मुस्लिम राजनीतिक पहचान 1924 में खिलाफत समाप्त होने के बाद दिशा-विहीन हो गई थी। उसका प्रकटीकरण संवैधानिक वार्ता की अपेक्षा साम्प्रदायिक हिंसा के रूप में अधिक दिखाई दिया।
1920 में नागपुर अधिवेशन में गांधी द्वारा खिलाफत गठबंधन अपनाए जाने के बाद जिन्ना कांग्रेस से अलग हो गए थे। इसके बाद उन्होंने कई वर्षों तक ऐसा संवैधानिक ढाँचा खोजने का प्रयास किया जो संयुक्त भारत को व्यवहार्य बना सके। चौदह सूत्र उस प्रयास का अंतिम दर्ज उदाहरण थे।
चौदह सूत्र — उनकी संकेतक भाषा
गांधी के जिन्ना और चौदह सूत्र पाठकों के सामने यह प्रश्न रखते हैं कि इन प्रावधानों का निर्माण 1929 में जिन्ना की स्थिति के बारे में क्या संकेत देता है। यहाँ केवल सूत्रों की विषयवस्तु का नहीं, बल्कि उन्हें तैयार करने के निहितार्थों का भी परीक्षण किया जाता है।
सूत्र 1 — प्रांतीय अवशिष्ट अधिकारों वाला संघीय संविधान: इसका उद्देश्य केंद्र में बहुसंख्यक प्रभुत्व से सुरक्षा प्राप्त करना था। एकात्मक व्यवस्था में मुस्लिम अल्पसंख्यक राजनीतिक रूप से गौण हो सकते थे। जिन्ना संवैधानिक सुरक्षा चाहते थे।
सूत्र 2 — सभी प्रांतों के लिए समान स्वायत्तता: इसका उद्देश्य पंजाब और बंगाल जैसे मुस्लिम-बहुल प्रांतों को केंद्रीय हस्तक्षेप से सुरक्षित रखना था।
सूत्र 3 — राज्यों की सहमति बिना संवैधानिक संशोधन नहीं: इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि बहुमत बाद में संवैधानिक व्यवस्था को एकतरफा न बदल सके।
सूत्र 4 — सभी विधानमंडलों में पर्याप्त अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व: इसका उद्देश्य राजनीतिक उपेक्षा से सुरक्षा था। बिना आरक्षित प्रतिनिधित्व के मुस्लिम समुदाय अनेक प्रांतों में प्रभावहीन हो सकते थे।
सूत्र 5 — केंद्रीय विधानमंडल में एक-तिहाई मुस्लिम प्रतिनिधित्व: यह वह न्यूनतम स्तर था जिसके नीचे राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम उपस्थिति केवल प्रतीकात्मक रह जाती।
सूत्र 6 — पृथक निर्वाचन मंडल: इसका उद्देश्य मिश्रित निर्वाचन क्षेत्रों में संख्यात्मक बहुमत के प्रभाव से सुरक्षा प्राप्त करना था।
सूत्र 7 — धार्मिक स्वतंत्रता: इसका उद्देश्य मुस्लिम व्यक्तिगत विधि, धार्मिक आचरण और संस्थागत व्यवस्था को विधायी हस्तक्षेप से सुरक्षित रखना था।
सूत्र 8 — मुस्लिम बहुलता घटाने वाले क्षेत्रीय परिवर्तन नहीं: इसका उद्देश्य पंजाब और बंगाल जैसे क्षेत्रों की जनसंख्या संरचना को प्रशासनिक पुनर्गठन से प्रभावित होने से बचाना था।
सूत्र 9 से 14 — सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, बलूचिस्तान, शासकीय सेवाओं में प्रतिनिधित्व, स्वशासी संस्थाएँ तथा अल्पसंख्यक हितों से जुड़े विधेयकों पर तीन-चौथाई वीटो: ये सभी संयुक्त भारत के भीतर सुरक्षा की अतिरिक्त संवैधानिक गारंटियाँ थीं।
संकेतक भाषा क्या दर्शाती है
गांधी के जिन्ना और चौदह सूत्र एक महत्वपूर्ण अवलोकन प्रस्तुत करते हैं।
चौदहों प्रावधान रक्षात्मक थे, आक्रामक नहीं। इनमें से किसी भी सूत्र में मुस्लिम प्रभुत्व, पृथक भूभाग या अन्य समुदायों पर वर्चस्व की माँग नहीं की गई थी। प्रत्येक सूत्र संयुक्त भारत के भीतर न्यूनतम सुरक्षा की माँग करता था।
यदि 1929 में जिन्ना का लक्ष्य पाकिस्तान होता, तो वे संयुक्त भारत को चलाने के लिए चौदह रक्षात्मक प्रावधान प्रस्तुत नहीं करते। वे पृथक्करण की माँग करते। उपलब्ध अभिलेख दर्शाते हैं कि उन्होंने सुरक्षा उपाय प्रस्तावित किए, प्रभुत्व की माँग नहीं। यही अंतर इस लेख का प्रमुख बिंदु है।
जिन्ना द्वारा प्रस्तुत संशोधनों को कांग्रेस ने स्वीकार नहीं किया। गांधी के जिन्ना और चौदह सूत्र इस अस्वीकृति को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में रखते हैं। इसके बाद जिन्ना ने आगे भागीदारी से इंकार कर दिया। कांग्रेस और जिन्ना के बीच बचा अंतिम संवैधानिक पुल भी समाप्त हो गया।
गांधी के जिन्ना और चौदह सूत्र इस दर्ज अस्वीकृति को उस आठ वर्षीय साम्प्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि में रखते हैं जिसका विवरण श्रृंखला ने ब्लॉग 80 में प्रस्तुत किया है। 1929 तक गांधी द्वारा निर्मित संगठित मुस्लिम राजनीतिक पहचान आठ वर्षों से दंगों की श्रृंखला के बीच थी। यही पहचान 1921 के मोपला विद्रोह में अपनी विनाशकारी क्षमता दिखा चुकी थी। इसी पहचान के कारण 1924 में कोहाट की पूरी हिंदू आबादी को पलायन करना पड़ा था। अप्रैल 1927 तक के बारह महीनों में चालीस दंगे भी इसी अवधि में हुए थे। जिन्ना इसी राजनीतिक वास्तविकता को संवैधानिक ढाँचे में समाहित करने का प्रयास कर रहे थे। उनके चौदह रक्षात्मक प्रावधान प्रभुत्व की माँग नहीं थे। वे उस न्यूनतम सीमा का निर्धारण थे जिसके नीचे संयुक्त भारत में मुस्लिम राजनीतिक अस्तित्व कठिन हो जाता।
जिन्ना इस संगठित पहचान की प्रदर्शित विनाशकारी क्षमता को देख चुके थे। उन्होंने दंगों की श्रृंखला, पलायनों और बढ़ती साम्प्रदायिक हिंसा को देखा था। फिर भी उनके चौदह सूत्र शक्ति-प्रदर्शन के आधार पर तैयार नहीं किए गए थे। वे एक संवैधानिक मार्ग के समर्थक और राष्ट्रवादी की माँगें थीं, जन-उत्तेजना के संचालक की नहीं। कांग्रेस ने उस न्यूनतम सीमा को स्वीकार नहीं किया। जिन्ना अलग हो गए। गांधी द्वारा निर्मित संगठित जनसमूह अगले छह वर्षों तक किसी संवैधानिक माध्यम से वंचित रहा। 1935 में जब जिन्ना ने मुस्लिम लीग का नेतृत्व संभाला, तब उसे वह संवैधानिक माध्यम उपलब्ध हुआ।
अभियोजन पक्ष का दृष्टिकोण
गांधी के जिन्ना और चौदह सूत्र पाठकों के सामने तीन प्रश्न रखते हैं। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर उपलब्ध अभिलेखों से खोजा जा सकता है।
- क्या जिन्ना के चौदह सूत्र, जिनका प्रत्येक प्रावधान रक्षात्मक था और कोई भी आक्रामक नहीं था, संयुक्त स्वतंत्र भारत को संवैधानिक ढाँचे में मुस्लिम समुदायों के लिए व्यवहार्य बनाने का एक दर्ज प्रयास थे?
- क्या 1929 में कांग्रेस द्वारा चौदह सूत्रों की अस्वीकृति उस आठ वर्षीय साम्प्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि में हुई थी जिसे गांधी के खिलाफत प्रयोग ने उत्पन्न किया और नियंत्रित नहीं कर सका?
- क्या चौदह रक्षात्मक प्रावधानों की संकेतक भाषा, जिन्हें उस व्यक्ति ने प्रस्तुत किया था जिसका संवैधानिक मार्ग गांधी ने 1920 के नागपुर अधिवेशन में बंद कर दिया था, नागपुर और दिल्ली के बीच के नौ वर्षों के परिणामों के बारे में कुछ दर्शाती है?
श्रृंखला इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देती। चौदह सूत्र पाठकों के सामने रखे जाते हैं। उनकी अस्वीकृति भी पाठकों के सामने रखी जाती है। आठ वर्षों की दंगा-श्रृंखला भी प्रस्तुत की जाती है। इन तीनों का परीक्षण कर निष्कर्ष निकालना पाठकों का कार्य है।
1916 — लखनऊ समझौता: जिन्ना हिंदू-मुस्लिम संवैधानिक एकता का निर्माण कर रहे थे। 1920 — नागपुर: गांधी ने उस संवैधानिक मार्ग को समाप्त कर दिया। 1921 से 1929 — आठ वर्षों में दंगा-श्रृंखला सबने देखी । 1929 — जिन्ना: संयुक्त भारत को मुस्लमान पक्ष को व्यावहारिक बनाने हेतु चौदह रक्षात्मक प्रावधान प्रस्ताव रखा। कांग्रेस: अस्वीकृति नहीं हुई। अभियोजन पक्ष पाठकों के सामने चौदह सुरक्षा प्रावधानों की संकेतक भाषा और उनकी अस्वीकृति की दर्ज पृष्ठभूमि प्रस्तुत करता है। निष्कर्ष पाठक स्वयं निकालेंगे।
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शब्दावली
- चौदह सूत्र (Fourteen Points): 1929 में मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा प्रस्तुत संवैधानिक प्रस्तावों का समूह, जिसका उद्देश्य संयुक्त भारत में मुस्लिम समुदायों के राजनीतिक अधिकारों और सुरक्षा की गारंटी सुनिश्चित करना था।
- संकेतक भाषा (Body Language): इस श्रृंखला में प्रयुक्त विश्लेषणात्मक शब्द, जिसका अर्थ किसी प्रस्ताव, निर्णय या दस्तावेज़ की अंतर्निहित दिशा, उद्देश्य और मानसिकता से है।
- अवशिष्ट अधिकार (Residual Powers): वे अधिकार जो संघीय संविधान में केंद्र को स्पष्ट रूप से न दिए जाएँ और प्रांतों के पास बने रहें।
- संघीय संविधान (Federal Constitution): ऐसी शासन व्यवस्था जिसमें केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों का संवैधानिक विभाजन निर्धारित होता है।
- पृथक निर्वाचन मंडल (Separate Electorates): ऐसी निर्वाचन व्यवस्था जिसमें विभिन्न धार्मिक या सामुदायिक समूह अपने प्रतिनिधियों का चुनाव अलग मतदाता सूची से करते हैं।
- अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व (Minority Representation): विधायिकाओं और सार्वजनिक संस्थाओं में अल्पसंख्यक समुदायों की सुनिश्चित भागीदारी।
- खिलाफत प्रयोग (Khilafat Experiment): गांधी द्वारा 1919–1924 के दौरान खिलाफत आंदोलन के साथ किए गए राजनीतिक सहयोग को इस श्रृंखला में दिया गया नाम।
- संगठित मुस्लिम राजनीतिक पहचान (Consolidated Muslim Political Identity): खिलाफत काल के दौरान निर्मित वह राजनीतिक एकजुटता जिसे यह श्रृंखला एक प्रमुख ऐतिहासिक परिणाम के रूप में प्रस्तुत करती है।
- दंगा-श्रृंखला (Riot Cascade): इस श्रृंखला द्वारा गढ़ा गया प्रमुख शब्द, जो 1921 से आगे लगातार घटित साम्प्रदायिक दंगों की क्रमिक श्रृंखला को दर्शाता है।
- संवैधानिक मार्ग (Constitutional Path): राजनीतिक मतभेदों के समाधान के लिए विधायी, संवैधानिक और संस्थागत प्रक्रियाओं पर आधारित दृष्टिकोण।
- लखनऊ समझौता (Lucknow Pact): 1916 का कांग्रेस-मुस्लिम लीग समझौता, जिसे हिंदू-मुस्लिम संवैधानिक सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
- नागपुर अधिवेशन (Nagpur Session): 1920 का कांग्रेस अधिवेशन जिसमें गांधी की नई राजनीतिक दिशा और खिलाफत सहयोग को प्रमुखता मिली।
- राजनीतिक उपेक्षा (Political Erasure): ऐसी स्थिति जिसमें कोई समुदाय जनसंख्या या निर्वाचन व्यवस्था के कारण प्रभावी प्रतिनिधित्व से वंचित हो जाए।
- संवैधानिक पुल (Constitutional Bridge): इस लेख में प्रयुक्त रूपक, जो कांग्रेस और जिन्ना के बीच शेष संवैधानिक सहयोग की संभावना को दर्शाता है।
- तीन-चौथाई वीटो (Three-Fourths Veto): जिन्ना के प्रस्तावों में वर्णित वह सुरक्षा व्यवस्था जिसके अंतर्गत अल्पसंख्यक हितों को प्रभावित करने वाले विधेयकों को रोकने का विशेष अधिकार प्रस्तावित था।
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Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)
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