गांधी का खिलाफत प्रयोग—विनाशक: इस प्रयोग ने किन तीन बातों को नष्ट किया (116)
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भाग 116: महात्मा गांधी के शांति प्रयास | श्रृंखला अनुक्रमणिका
ब्लॉग 102 से 115 तक पाठक के सामने खिलाफत प्रयोग का पूरा चित्र रखते हैं। इनमें संस्था, उद्देश्य, चेतावनियाँ, कार्यप्रणाली, स्वीकारोक्ति, प्राथमिकताओं का परिवर्तन और इस अभियान का प्रलेखित स्वरूप प्रस्तुत किया गया है। गांधी का खिलाफत प्रयोग अब इस श्रृंखला में स्थापित तीन प्रलेखित क्रमों के आधार पर बताता है कि इस प्रयोग ने क्या नष्ट किया।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!प्रयोग का अपेक्षित परिणाम
गांधी का खिलाफत प्रयोग—विनाशक पहले इस प्रयोग के प्रलेखित उद्देश्य को प्रस्तुत करता है। ब्लॉग 114 में गांधी का तर्क स्पष्ट है। उनके अनुसार स्वराज का आधार हिन्दू-मुस्लिम एकता थी। यदि कांग्रेस खिलाफत के विषय में मुस्लिम समाज का साथ देगी तो यह एकता स्थायी बनेगी। इसलिए इस प्रयोग से तीन परिणाम अपेक्षित थे। हिन्दू-मुस्लिम एकता, कांग्रेस की सुदृढ़ता और राष्ट्रीय आंदोलन में मुस्लिम राजनीतिक समाज का समावेश।
अभियोजन प्रयोग के अपेक्षित परिणाम और उसके वास्तविक परिणामों को साथ रखता है।
पहली नष्ट हुई बात—हिन्दू-मुस्लिम एकता
गांधी का खिलाफत प्रयोग—विनाशक प्रयोग से पहले और उसके बाद के हिन्दू-मुस्लिम संबंधों का प्रलेखित चित्र प्रस्तुत करता है। इतिहासकार एस. गोपाल के अनुसार खिलाफत गठबंधन से पहले बाईस वर्षों में सोलह सांप्रदायिक दंगे हुए। इसके बाद केवल तीन वर्षों में बहत्तर दंगे हुए।
प्रयोग का उद्देश्य स्थायी हिन्दू-मुस्लिम एकता था। किन्तु गांधी ने सन् उन्नीस सौ चौबीस में स्वयं लिखा, “इसने मुसलमानों को संगठित और जागृत किया। इससे मौलवियों को वह प्रतिष्ठा मिली जो पहले कभी नहीं थी।” (यंग इंडिया, उनतीस मई उन्नीस सौ चौबीस, सीडब्ल्यूएमजी, खंड चौबीस, पृष्ठ एक सौ छत्तीस)। यह कथन उसी समय की बढ़ती सांप्रदायिक घटनाओं के साथ रखा जाता है।
सन् उन्नीस सौ बीस का हिजरत भी इसी धार्मिक जागरण का परिणाम था। लगभग अठारह हजार मुसलमान, धार्मिक नेतृत्व के आह्वान पर, भारत को दार-उल-हरब मानकर अफगानिस्तान चले गए। अफगानिस्तान ने उन्हें वापस लौटा दिया और अनेक लोग निर्धनता में लौटे। जिस प्रयोग का उद्देश्य एकता था, उसने पहले ही वर्ष हजारों लोगों को कठिनाई में पहुँचा दिया।
दूसरी नष्ट हुई बात—कांग्रेस का पंथनिरपेक्ष स्वरूप
गांधी का खिलाफत प्रयोग—विनाशक कांग्रेस में हुए प्रलेखित परिवर्तन को सामने रखता है। सन् उन्नीस सौ बीस से पहले कांग्रेस का आधार पंथनिरपेक्ष राष्ट्रीय राजनीति था। सन् उन्नीस सौ सोलह का लखनऊ समझौता, जिसे जिन्ना और तिलक ने मिलकर बनाया था, इसी संवैधानिक परंपरा का उदाहरण था।
सितंबर उन्नीस सौ बीस के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस ने खिलाफत को अपने प्रमुख अभियान से जोड़ दिया। यह परिवर्तन ब्लॉग 105 और ब्लॉग 108 में स्थापित किया गया है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने लिखा कि असहयोग आंदोलन का आरंभ खिलाफत समिति ने किया था। उसका प्रमुख उद्देश्य स्वराज नहीं बल्कि खिलाफत का समर्थन था।
सन् उन्नीस सौ बीस के नागपुर अधिवेशन में जिन्ना का कांग्रेस से अलग होना इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण बिंदु था। यही वह प्रलेखित बिंदु था जहाँ संवैधानिक पंथनिरपेक्ष राजनीति और गांधी की धार्मिक जन-संगठन की पद्धति स्थायी रूप से अलग हो गईं। कांग्रेस का पंथनिरपेक्ष स्वरूप इस प्रयोग की दूसरी बड़ी क्षति बना।
तीसरी नष्ट हुई बात—मुस्लिम राजनीतिक भविष्य
गांधी का खिलाफत प्रयोग—विनाशक मुस्लिम राजनीति के प्रलेखित क्रम को भी सामने रखता है। खिलाफत प्रयोग से पहले जिन्ना संवैधानिक मुस्लिम नेतृत्व का प्रमुख चेहरा थे। लखनऊ समझौता, चौदह सूत्र और कलकत्ता के चार संशोधन ऐसे संवैधानिक प्रयास थे जिनका उद्देश्य मुस्लिम राजनीतिक हितों को साझा राष्ट्रीय व्यवस्था के भीतर स्थान देना था।
खिलाफत प्रयोग ने धार्मिक नेतृत्व को अभूतपूर्व प्रतिष्ठा दी। गांधी ने स्वयं लिखा, “इसने मौलवियों को वह प्रतिष्ठा दी जो उन्हें पहले कभी प्राप्त नहीं हुई थी।” इसके साथ ही संवैधानिक मुस्लिम नेतृत्व का प्रभाव घटता गया। ब्लॉग इक्यासी से अट्ठानवे तक जिन्ना की प्रलेखित यात्रा (जिन्ना क्रम, कांग्रेस और मुस्लिम लीग का विभाजन, समापन क्रम) बताती है कि अंततः जिन्ना को उसी सांप्रदायिक ढाँचे को अपनाना पड़ा जिसे खिलाफत प्रयोग ने मान्यता दी थी। इसका परिणाम मार्च उन्नीस सौ चालीस का लाहौर प्रस्ताव बना। इस प्रकार संवैधानिक, पंथनिरपेक्ष और राष्ट्रीय व्यवस्था से जुड़ा मुस्लिम राजनीतिक भविष्य इस प्रयोग की तीसरी बड़ी क्षति बना।
मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क के निर्णय ने इन तीनों परिणामों पर अंतिम मुहर लगा दी। तुर्की ने नवंबर उन्नीस सौ बाईस में सल्तनत और मार्च उन्नीस सौ चौबीस में खिलाफत समाप्त कर दी। जिस उद्देश्य पर पूरा प्रयोग आधारित था, वही समाप्त हो गया। अपेक्षित एकता के स्थान पर सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी। कांग्रेस ने धार्मिक जन-संगठन को स्थायी राजनीतिक साधन बना लिया। जिस नेतृत्व को प्रतिष्ठा मिली, वह संवैधानिक नहीं बल्कि धार्मिक नेतृत्व था।

अभियोजन का पक्ष
गांधी का खिलाफत प्रयोग—विनाशक पाठक के सामने तीन प्रश्न रखता है।
- क्या स्थायी हिन्दू-मुस्लिम एकता के उद्देश्य से आरंभ किया गया यह प्रयोग, गांधी की सन् उन्नीस सौ चौबीस की स्वीकारोक्ति के अनुसार, संगठित मुस्लिम राजनीतिक शक्ति, बढ़ी हुई धार्मिक नेतृत्व की प्रतिष्ठा और बाईस वर्षों के सोलह दंगों की तुलना में केवल तीन वर्षों में बहत्तर सांप्रदायिक दंगों का कारण बना?
- क्या सितंबर उन्नीस सौ बीस के कलकत्ता अधिवेशन ने कांग्रेस को उसके पंथनिरपेक्ष संवैधानिक आधार से हटाकर विदेशी धार्मिक साम्राज्य की क्षेत्रीय माँगों का समर्थक बना दिया? क्या नागपुर में जिन्ना का प्रस्थान इसी परिवर्तन का निर्णायक बिंदु था?
- क्या गांधी की सन् उन्नीस सौ चौबीस की स्वीकारोक्ति से प्रमाणित धार्मिक नेतृत्व की बढ़ी हुई प्रतिष्ठा ने जिन्ना द्वारा प्रस्तुत संवैधानिक मुस्लिम राजनीतिक दिशा को समाप्त कर दिया और अंततः मार्च उन्नीस सौ चालीस के लाहौर प्रस्ताव तक पहुँचने वाला सांप्रदायिक क्रम निर्मित किया?
यह श्रृंखला इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देती। गांधी का खिलाफत प्रयोग—विनाशक केवल यह दिखाता है कि प्रयोग का उद्देश्य क्या था और उसके प्रलेखित परिणाम क्या बने। अंतिम निष्कर्ष पाठक स्वयं निकालेगा।
प्रतिरक्षा पक्ष के लिए आमंत्रण
अब प्रतिरक्षा पक्ष का अवसर है। हम उन्हें आमंत्रित करते हैं कि वे अपने प्रमाण प्रस्तुत करें और अभियोजन द्वारा स्थापित विवरण को चुनौती दें।
प्रयोग का उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम एकता था। बाईस वर्षों के सोलह दंगे तीन वर्षों में बहत्तर हो गए। उद्देश्य कांग्रेस को सुदृढ़ करना था। उसके स्थान पर पंथनिरपेक्ष संवैधानिक परंपरा की जगह धार्मिक जन-संगठन ने ले ली। उद्देश्य मुस्लिम राजनीतिक जीवन को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ना था। परिणामस्वरूप धार्मिक नेतृत्व को प्रतिष्ठा मिली, जिन्ना कांग्रेस से अलग हुए और मार्च उन्नीस सौ चालीस का लाहौर प्रस्ताव सामने आया। जिस उद्देश्य के लिए यह प्रयोग आरंभ हुआ था, उसे तुर्की ने स्वयं समाप्त कर दिया। गांधी ने सन् उन्नीस सौ चौबीस में लिखा, “इसने मुसलमानों को संगठित और जागृत किया। इसने मौलवियों को वह प्रतिष्ठा दी जो उन्हें पहले कभी नहीं मिली।” अभियोजन प्रयोग के उद्देश्य और उसके परिणामों को साथ रखता है। अंतिम निष्कर्ष पाठक स्वयं निकाले।
मुख्य चित्र: चित्र देखने के लिए यहां क्लिक करें।
वीडियो
शब्दावली
1) शब्दावली (Glossary of Terms)
- खिलाफत प्रयोग: महात्मा गांधी द्वारा हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करने के उद्देश्य से खिलाफत आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने की राजनीतिक नीति।
- खिलाफत आंदोलन: प्रथम विश्वयुद्ध के बाद उस्मानी खिलाफत को बनाए रखने के लिए चलाया गया अंतरराष्ट्रीय इस्लामी आंदोलन।
- खलीफा: इस्लामी परंपरा में समस्त मुस्लिम समाज का धार्मिक एवं राजनीतिक प्रमुख माना जाने वाला पद।
- हिन्दू-मुस्लिम एकता: गांधी द्वारा स्वराज प्राप्ति के लिए आवश्यक बताई गई स्थायी राजनीतिक और सामाजिक एकजुटता।
- पंथनिरपेक्ष संवैधानिक परंपरा: धार्मिक आधार से अलग रहकर संविधान और प्रतिनिधिक राजनीति पर आधारित राष्ट्रीय कार्यपद्धति।
- धार्मिक नेतृत्व: मौलवियों तथा अन्य धार्मिक नेताओं का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव, जिसे गांधी ने स्वयं बढ़ा हुआ स्वीकार किया।
- संवैधानिक मुस्लिम नेतृत्व: वह मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व जो संवैधानिक उपायों और वार्ताओं के माध्यम से अधिकारों की प्राप्ति का पक्षधर था, जिसका प्रमुख प्रतिनिधित्व मोहम्मद अली जिन्ना ने किया।
- हिजरत (1920): धार्मिक आह्वान के बाद लगभग अठारह हजार भारतीय मुसलमानों का अफगानिस्तान की ओर किया गया सामूहिक प्रस्थान।
- दार-उल-हरब: इस्लामी न्यायशास्त्र का शब्द, जिसका अर्थ है ऐसा क्षेत्र जहाँ इस्लामी शासन नहीं है और जिसे संघर्ष का क्षेत्र माना जाता है।
- लखनऊ समझौता (1916): भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच हुआ संवैधानिक समझौता, जिसे तिलक और जिन्ना ने आगे बढ़ाया।
- लाहौर प्रस्ताव (1940): मुस्लिम लीग द्वारा पारित वह प्रस्ताव जिसने आगे चलकर पाकिस्तान की मांग का आधार बनाया।
- जिन्ना क्रम (The Jinnah Arc): इस श्रृंखला का विशिष्ट विश्लेषणात्मक क्रम, जिसमें जिन्ना की संवैधानिक राजनीति से लाहौर प्रस्ताव तक की यात्रा का प्रलेखित अध्ययन किया गया है।
- विनाशक (The Destroyer): इस ब्लॉग का विशिष्ट विषय, जिसमें खिलाफत प्रयोग द्वारा प्रभावित तीन प्रमुख राजनीतिक एवं राष्ट्रीय आधारों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
- अतातुर्क निर्णय: मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क द्वारा सुल्तानी शासन और खिलाफत समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय, जिसने खिलाफत आंदोलन का आधार समाप्त कर दिया।
- सीडब्ल्यूएमजी (CWMG): Collected Works of Mahatma Gandhi—महात्मा गांधी के लेखों, पत्रों और भाषणों का आधिकारिक प्रकाशित संग्रह।
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Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)
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