गांधी का अवसरवाद: उनके अपने अभिलेखित शब्द — और उसे पाने के लिए उन्होंने क्या उपेक्षित किया (103)
भारत / GB
भाग 103: महात्मा गांधी के शान्ति प्रयास | श्रृंखला अनुक्रम
ब्लॉग 102 में उस्मानी खिलाफत क्या थी, ब्रिटेन ने उसके साथ वास्तव में क्या किया और क्या नहीं किया, तथा उसकी माँगें धार्मिक नहीं बल्कि भौगोलिक अधिकारों से जुड़ी क्यों थीं, इसका अभिलेखित अध्ययन प्रस्तुत किया गया था। यह लेख गांधी के अपने अभिलेखित शब्दों को पाठक के सामने रखता है कि उन्होंने खिलाफत का समर्थन क्यों स्वीकार किया और उस निर्णय के लिए उन्होंने किन आपत्तियों की उपेक्षा की।
की गई कार्रवाई: गांधी ने अली बंधुओं को अपने प्राथमिक राजनीतिक दूतों के रूप में चुना, और उनके अधिकार का बारंबार समर्थन किया, यद्यपि वे धार्मिक निष्ठा को भारतीय नागरिक शासन से श्रेष्ठ घोषित कर रहे थे।
किसे मूल्य चुकाना पड़ा: भारतीय मुस्लिम समुदाय के भीतर के आधुनिक धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व को, जिसे पुनरुत्थानवादी धर्मशास्त्रीय वक्ताओं के पक्ष में दरकिनार कर दिया गया।
किस विकल्प की उपेक्षा की गई: गैर-सांप्रदायिक, संवैधानिक मुस्लिम जन-प्रतिनिधियों के साथ गठबंधन करना, जिन्होंने अखिल-इस्लामी पुनरुत्थान के स्थान पर भारतीय आत्मनिर्णय को प्राथमिकता दी।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: करिश्माई अखिल-इस्लामी मौलवियों को राष्ट्रीय नेतृत्व के सर्वोच्च स्तर पर स्थापित किया, जिससे एक ऐसी मिसाल कायम हुई जहां धार्मिक कट्टरता को आधिकारिक कांग्रेसी संरक्षण प्रदान किया गया।
गांधी के अपने अभिलेखित शब्द
गांधी का अवसरवाद इस विषय के सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख को आरम्भ में ही पाठक के सामने रखता है। यह अभिलेख स्वयं गांधी द्वारा खिलाफत के विषय में कही गई बात है।
गांधी ने खिलाफत के प्रश्न को अपने शब्दों में “जीवन का एकमात्र अवसर” कहा। उनके अनुसार यह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच स्थायी सहयोग स्थापित करने तथा मुसलमानों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने का अवसर था। यह किसी अन्य लेखक का निष्कर्ष नहीं, बल्कि गांधी के अपने अभिलेखित शब्द हैं।
अभियोजन पक्ष इसके साथ एक और अभिलेखित तथ्य रखता है। गांधी स्वयं खिलाफत व्यवस्था में आस्था नहीं रखते थे। उनका समर्थन व्यावहारिक उद्देश्य से था। वे मुसलमान नहीं थे और उस्मानी सुल्तान की धार्मिक सत्ता से उनका कोई व्यक्तिगत सम्बन्ध नहीं था। ब्लॉग 102 में दिखाया गया है कि यह एक पराजित विदेशी साम्राज्य की भौगोलिक सत्ता पुनः स्थापित करने की माँग थी। गांधी ने इसे इसलिए अपनाया क्योंकि उन्हें विश्वास था कि इससे भारत के मुसलमान स्वतन्त्रता आन्दोलन में सम्मिलित होंगे।
गांधी ने किन आपत्तियों की उपेक्षा की
गांधी का अवसरवाद उन अभिलेखित आपत्तियों को भी पाठक के सामने रखता है जिन्हें गांधी ने अपने इस निर्णय के लिए स्वीकार नहीं किया।
1. राजनीतिक चेतावनी: एम. ए. जिन्ना
पहली अभिलेखित आपत्ति जिन्ना की थी, जिसका उल्लेख ब्लॉग 82 में किया गया है। नागपुर अधिवेशन, उन्नीस सौ बीस में जिन्ना ने गांधी को स्पष्ट रूप से कहा कि राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन को खिलाफत के धार्मिक पक्ष से जोड़ना दीर्घकाल में उचित नहीं होगा। गांधी के समर्थन में उपस्थित गांधी द्वारा संगठित मुस्लिम बहुमत ने उनका विरोध किया। इसके बाद जिन्ना ने इस नीति का समर्थन करने के स्थान पर कांग्रेस छोड़ना स्वीकार किया। यह निजी मतभेद नहीं, बल्कि कांग्रेस के सार्वजनिक मंच पर दी गई स्पष्ट चेतावनी थी।
2. वैचारिक चेतावनी: एनी बेसेन्ट
दूसरी अभिलेखित आपत्ति एनी बेसेन्ट की थी। वे थियोसोफिकल सोसाइटी की अध्यक्ष तथा कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री थीं। उन्होंने गांधी को सावधान किया कि धर्म और राजनीति का मेल भविष्य में विभाजनकारी परिणाम उत्पन्न कर सकता है। उनका मत था कि धार्मिक आधार पर संगठित आन्दोलन मूल उद्देश्य समाप्त होने के बाद धार्मिक आधार पर ही बिखर सकता है। आगे की कड़ियों में पाठक इस चेतावनी की तुलना बाद की घटनाओं से स्वयं कर सकता है।
3. संस्थागत मर्यादा: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
तीसरी उपेक्षित मर्यादा स्वयं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की थी। कांग्रेस एक धर्मनिरपेक्ष स्वतन्त्रता संगठन थी। किसी विदेशी साम्राज्य की धार्मिक-राजनीतिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना को स्वराज के साथ कांग्रेस की औपचारिक माँग बनाना उसके मूल स्वरूप में परिवर्तन था। इस श्रृंखला में पहले ही दिखाया गया है कि गांधी का कांग्रेस पर अत्यन्त प्रभाव था। उन्होंने उसी प्रभाव का उपयोग करके इस संस्थागत मर्यादा को पीछे रखा।
franpritchett.com पर उपलब्ध डॉ. अम्बेडकर के मूल स्रोत के अनुसार असहयोग आन्दोलन का आरम्भ खिलाफत समिति ने किया था। कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन ने उसी निर्णय को स्वीकार किया जिसे खिलाफत सम्मेलन पहले ही अपना चुका था। इस प्रकार गांधी के हस्तक्षेप से राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन ने एक विदेशी धार्मिक-राजनीतिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना की माँग को अपनी औपचारिक माँगों में सम्मिलित कर लिया।
अवसर के पीछे अभिलेखित तर्क
गांधी का अवसरवाद गांधी के अपने अभिलेखित तर्क को पाठक के सामने रखता है। गांधी का मानना था कि हिन्दुओं और मुसलमानों को निकट लाए बिना व्यापक असहयोग आन्दोलन संगठित नहीं किया जा सकता। उनके विचार में खिलाफत का प्रश्न उपलब्ध माध्यम था जो भारत के मुसलमानों से गहरा प्रभाव रखता था। इसी कारण उन्होंने इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अधिक व्यापक संयुक्त मोर्चा बनाने का साधन माना।
अभियोजन पक्ष इस तर्क के साथ उस संस्था का अभिलेखित स्वरूप भी रखता है। गांधी ने जिस विषय को अपना अवसर कहा, उसकी माँगें भौगोलिक अधिकारों से सम्बन्धित थीं। ब्रिटेन ने उस संस्था पर धार्मिक संस्था के रूप में आक्रमण नहीं किया था। उसी संस्था को उसके उत्तराधिकारी तुर्की राज्य ने चार वर्षों के भीतर समाप्त भी कर दिया। इस प्रकार गांधी के अपने शब्द—”जीवन का एकमात्र अवसर”—को उस विषय और उन उपेक्षित आपत्तियों के साथ पाठक के सामने रखा गया है।

अभियोजन पक्ष का मत
गांधी का अवसरवाद पाठक के सामने तीन प्रश्न रखता है।
- क्या गांधी ने अपने ही अभिलेखित शब्दों के अनुसार खिलाफत के प्रश्न को “जीवन का एकमात्र अवसर” मानकर अपनाया, जबकि वे स्वयं खिलाफत व्यवस्था में आस्था नहीं रखते थे और उसकी माँगें धार्मिक नहीं बल्कि भौगोलिक अधिकारों से सम्बन्धित थीं?
- क्या गांधी ने अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए जिन्ना की उन्नीस सौ बीस की अभिलेखित चेतावनी, एनी बेसेन्ट की अभिलेखित चेतावनी तथा कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष संस्थागत मर्यादा को पीछे रखा?
- क्या गांधी द्वारा अवसर के रूप में अपनाया गया विषय—एक पराजित विदेशी साम्राज्य की भौगोलिक पुनर्स्थापना की माँग, जिसे तुर्कों ने स्वयं उन्नीस सौ चौबीस में समाप्त कर दिया—उनके अपने अभिलेखित शब्दों के साथ पाठक के सामने रखा जाना चाहिए?
यह श्रृंखला इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देती। गांधी का अवसरवाद केवल गांधी के अपने अभिलेखित शब्द, उनके द्वारा उपेक्षित अभिलेखित आपत्तियाँ तथा उनके द्वारा अपनाए गए विषय का अभिलेखित स्वरूप पाठक के सामने रखता है। आगे का निष्कर्ष पाठक स्वयं निकाले।
प्रतिरक्षा पक्ष के लिए आमंत्रण
अब प्रतिरक्षा पक्ष को अपने प्रमाण प्रस्तुत करने और अभियोजन पक्ष द्वारा रखे गए विवरण को चुनौती देने का अवसर है।
गांधी के अपने अभिलेखित शब्द—”जीवन का एकमात्र अवसर।” गांधी स्वयं खिलाफत व्यवस्था में आस्था नहीं रखते थे। उनका समर्थन व्यावहारिक उद्देश्य से था। नागपुर में जिन्ना ने चेतावनी दी, उन्हें बोलने नहीं दिया गया और उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। एनी बेसेन्ट ने सम्भावित परिणामों की चेतावनी दी। कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष मर्यादा को गांधी के प्रभाव से पीछे रखा गया। अपनाया गया विषय एक पराजित विदेशी साम्राज्य की भौगोलिक पुनर्स्थापना की माँग थी, जिसे तुर्कों ने उन्नीस सौ चौबीस में समाप्त कर दिया। अभियोजन पक्ष गांधी के अपने अभिलेखित शब्द पाठक के सामने रखता है। आगे का निष्कर्ष पाठक स्वयं निकाले।
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शब्दावली
- खिलाफत आन्दोलन: प्रथम विश्व युद्ध के बाद उस्मानी खिलाफत को बनाए रखने के समर्थन में चला आन्दोलन, जिसे महात्मा गांधी ने हिन्दू-मुस्लिम एकता और राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ा।
- उस्मानी खिलाफत: उस्मानी सुल्तान के अधीन धार्मिक-राजनीतिक संस्था, जिसे तुर्की गणराज्य ने उन्नीस सौ चौबीस में समाप्त कर दिया।
- जीवन का एकमात्र अवसर: गांधी द्वारा प्रयुक्त अभिलेखित वाक्यांश, जिसके माध्यम से उन्होंने खिलाफत प्रश्न को हिन्दू-मुस्लिम सहयोग का अद्वितीय अवसर बताया।
- असहयोग आन्दोलन: उन्नीस सौ बीस में आरम्भ हुआ राष्ट्रीय आन्दोलन, जिसमें ब्रिटिश शासन के साथ असहयोग का मार्ग अपनाया गया।
- पैन-इस्लामी आन्दोलन: विभिन्न देशों के मुसलमानों की राजनीतिक एकता तथा खिलाफत के समर्थन का विचार।
- भौगोलिक पुनर्स्थापना: किसी पराजित राज्य या साम्राज्य के पूर्व भू-क्षेत्रों और राजनीतिक अधिकारों को पुनः स्थापित करने की माँग।
- एम. ए. जिन्ना: कांग्रेस के प्रमुख नेता जिन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन को खिलाफत प्रश्न से जोड़ने का विरोध किया और बाद में पाकिस्तान के संस्थापक बने।
- एनी बेसेन्ट: कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री और थियोसोफिकल सोसाइटी की अध्यक्षा, जिन्होंने धर्म और राजनीति के मिश्रण के परिणामों की चेतावनी दी।
- धर्मनिरपेक्ष संस्थागत मर्यादा: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वह मूल सिद्धान्त जिसके अनुसार संगठन किसी धार्मिक उद्देश्य के स्थान पर राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के लिए कार्य करता था।
- नागपुर कांग्रेस अधिवेशन (1920): कांग्रेस का अधिवेशन जहाँ गांधी की असहयोग नीति और खिलाफत सहयोग को स्वीकृति मिली तथा जिन्ना ने सार्वजनिक विरोध किया।
- खिलाफत समिति: खिलाफत आन्दोलन का संचालन करने वाली समिति, जिसके कार्यक्रम को बाद में कांग्रेस ने स्वीकार किया।
- कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन (1920): कांग्रेस का विशेष अधिवेशन जिसमें खिलाफत समिति के निर्णयों के अनुरूप असहयोग कार्यक्रम स्वीकार किया गया।
- अभिलेखित संस्था: इस श्रृंखला का प्रमुख वाक्यांश, जिसका अर्थ है ऐसी संस्था जिसका मूल्यांकन प्राथमिक ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर किया गया हो।
- अभिलेखित अवसर: इस श्रृंखला में प्रयुक्त विशेष वाक्यांश, जो गांधी द्वारा खिलाफत को “जीवन का एकमात्र अवसर” कहे जाने का अभिलेखित उल्लेख है।
- अभियोजन रूपरेखा: इस श्रृंखला की विश्लेषण पद्धति, जिसमें ऐतिहासिक दस्तावेजों को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर निष्कर्ष पाठक पर छोड़ा जाता है।
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Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)
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