गांधी के जिन्ना: एकता के दूत से विभाजन के निर्माता तक (82)
भारत / GB
भाग 82: महात्मा गांधी के शांति प्रयास | श्रृंखला सूचकांक
यह श्रृंखला अब मोपला प्रसंग से आगे बढ़कर तीन दशकों तक फैले एक दर्ज तथ्य की जांच करती है— मुहम्मद अली जिन्ना का वह परिवर्तन, जिसमें सरोजिनी नायडू द्वारा “हिंदू-मुस्लिम एकता के दूत” कहे जाने वाला व्यक्ति पाकिस्तान का संस्थापक बना। अभियोजन पाठक के सामने घटनाओं का क्रम रखता है। पाठक स्वयं देखेगा कि इस परिवर्तन में गांधी की नीतियों की क्या भूमिका रही।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!की गई कार्रवाई: 1920 में कांग्रेस-मौलवी गठबंधन द्वारा दरकिनार किए जाने के बाद, जिन्ना ने अंततः एक विरोधी, सुगठित सांप्रदायिक मंच के निर्माण के लिए धर्मनिरपेक्ष संवैधानिकता का परित्याग कर दिया।
किसे मूल्य चुकाना पड़ा: उपमहाद्वीप की क्षेत्रीय अखंडता को, जिसने अपने प्रमुख धर्मनिरपेक्ष विधिवेत्ता को अलगाववादी सांप्रदायिक राजनीति के हाथों खो दिया।
किस विकल्प की उपेक्षा की गई: अंतर-सामुदायिक अभिजात वर्ग के मध्य संवैधानिक सत्ता-साझेदारी के 1916 के लखनऊ समझौता ढांचे को संरक्षित रखना।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: प्रत्यक्ष कार्य-कारण प्रक्षेपवक्र को दर्शाता है: कैसे राष्ट्रीय मुख्यधारा में धर्मशास्त्रीय जुनून को शामिल करने से धर्मनिरपेक्ष मुस्लिम नेता अलग-थलग पड़ गए और मुस्लिम लीग के जन आधार के निर्माण को प्रोत्साहन मिला।
गांधी से पहले जिन्ना कौन थे
गांधी के जिन्ना की चर्चा इस तथ्यात्मक प्रश्न से आरम्भ होती है कि गांधी के राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख बनने से पहले जिन्ना की भूमिका क्या थी।
भारत कोकिला सरोजिनी नायडू ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को साथ लाने के प्रयासों के कारण जिन्ना को “हिंदू-मुस्लिम एकता का दूत” कहा था।
दिसंबर 1916 का लखनऊ समझौता, जिसकी रचना जिन्ना ने की थी, कांग्रेस और लीग सहयोग का सर्वोच्च बिंदु माना गया। कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों में उनका सम्मान था। तिलक और जिन्ना पहले से साथ काम कर चुके थे।
जिन्ना एक साथ कांग्रेस और मुस्लिम लीग के सदस्य थे। वे संवैधानिक सुधार, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद और वार्ता आधारित हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक सहयोग के समर्थक थे। उनका दृष्टिकोण तिलक के समान था— दो संगठन, एक लक्ष्य और लिखित समझौते।
क्या बदला: घटनाओं का क्रम
जिन्ना के परिवर्तन को समझने के लिए तीन प्रमुख घटनाएं सामने आती हैं।
अगस्त 1920— तिलक का निधन: 1 अगस्त 1920 को तिलक का निधन हुआ। वे कांग्रेस में जिन्ना के सबसे निकट सहयोगी थे। तिलक की मृत्यु और गांधी से बढ़ते मतभेदों के बाद जिन्ना ने 1920 में कांग्रेस छोड़ दी। इससे वह प्रमुख व्यक्ति भी चला गया जो जिन्ना और गांधी के बीच संवाद स्थापित कर सकता था।
दिसंबर 1920— नागपुर अधिवेशन: गांधी ने नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में खिलाफत प्रस्ताव प्रस्तुत किया। कांग्रेस द्वारा सत्याग्रह का मार्ग अपनाने पर जिन्ना ने विरोध किया और इसे राजनीतिक अव्यवस्था बताया। उन्होंने चेतावनी दी कि पैन-इस्लामी धार्मिक आंदोलन को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ना गंभीर भूल होगी। उनकी बात स्वीकार नहीं की गई और उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी।
1920-1935— पंद्रह वर्ष का राजनीतिक अंतराल: कांग्रेस छोड़ने के बाद जिन्ना ने कई बार संवैधानिक समझौते का प्रयास किया। 1929 के उनके चौदह सूत्र संयुक्त भारत के भीतर मुस्लिम राजनीतिक अधिकारों की रक्षा का प्रस्ताव थे। कांग्रेस ने इन्हें स्वीकार नहीं किया। प्रत्येक अस्वीकृति ने मुस्लिम राजनीतिक पहचान को अलग दिशा में आगे बढ़ाया। 1935 में जिन्ना पुनः मुस्लिम लीग के नेता बने। तब तक गांधी के खिलाफत प्रयोग से बनी एक संगठित मुस्लिम राजनीतिक पहचान उनके लिए उपलब्ध थी।
गांधी के खिलाफत प्रयोग ने जिन्ना को क्या दिया
गांधी के जिन्ना पाठक के सामने एक महत्वपूर्ण तथ्य रखता है।
जब जिन्ना ने 1920 में कांग्रेस छोड़ी, तब मुस्लिम लीग सीमित जनाधार वाला संगठन था। मुस्लिम समाज अनेक धाराओं में विभाजित था। कोई एकीकृत राजनीतिक पहचान नहीं थी।
गांधी के खिलाफत प्रयोग ने इन विभिन्न धाराओं को एक व्यापक पैन-इस्लामी राजनीतिक पहचान में बदल दिया। 1924 के बाद जब खिलाफत आंदोलन समाप्त हुआ, तब यह संगठित पहचान नेतृत्व की खोज में थी।
ब्लॉग 48 में इसका विस्तार से विश्लेषण किया गया है। उस दृष्टिकोण के अनुसार गांधी ने जिन्ना को मंच उपलब्ध कराया और जिन्ना ने उसे राजनीतिक दिशा दी। इसकी भारी सामाजिक कीमत उन लोगों ने चुकाई जिनकी इसमें कोई भूमिका नहीं थी।

वैकल्पिक मार्ग क्या था: जिन्ना का प्रतिनिधित्व
गांधी के जिन्ना एक और तथ्यात्मक प्रश्न उठाता है— जिन्ना का मूल मार्ग क्या था।
1916 का लखनऊ समझौता एक स्पष्ट सिद्धांत पर आधारित था। दो राजनीतिक संगठन वार्ता के माध्यम से एक संवैधानिक लक्ष्य की ओर बढ़ रहे थे। इस पद्धति में न खिलाफत की आवश्यकता थी और न धार्मिक आंदोलन की।
इस समझौते की सीमाएं थीं। इसमें पृथक निर्वाचन क्षेत्रों को स्वीकार किया गया था, जिसे बाद के आलोचकों ने सांप्रदायिक राजनीति को संस्थागत रूप देने वाला बताया। फिर भी यह कांग्रेस और लीग के बीच एक लिखित सहमति थी।
इसके विपरीत गांधी की नीति ने धार्मिक जनसक्रियता को प्राथमिकता दी। इससे आंदोलन का विस्तार हुआ और व्यापक जनसमर्थन मिला। साथ ही ऐसी परिस्थितियां भी बनीं जिनका उल्लेख इस श्रृंखला में पहले किया जा चुका है।
जब 1935 में जिन्ना मुस्लिम लीग का नेतृत्व करने लौटे, तब तक वह संवैधानिक मार्ग काफी कमजोर हो चुका था। उसकी जगह संगठित धार्मिक राजनीतिक पहचान ने ले ली थी।
अभियोजन का पक्ष
गांधी के जिन्ना यह दावा नहीं करता कि गांधी का उद्देश्य विभाजन था। यह केवल घटनाओं का क्रम प्रस्तुत करता है और पाठक से विचार करने को कहता है।
- क्या 1916 में जिन्ना हिंदू-मुस्लिम सहयोग के संवैधानिक मार्ग का प्रतिनिधित्व करते थे, जिसका प्रमाण लखनऊ समझौता है?
- क्या 1920 में नागपुर में गांधी के निर्णयों ने कांग्रेस से उस मुस्लिम नेता को दूर कर दिया जिसने कांग्रेस-लीग सहयोग का सबसे सफल समझौता तैयार किया था?
- क्या गांधी के खिलाफत प्रयोग ने उस संगठित मुस्लिम राजनीतिक आधार का निर्माण किया जिसे 1935 में जिन्ना ने प्राप्त किया?
- क्या यह महत्वपूर्ण नहीं है कि “हिंदू-मुस्लिम एकता का दूत” कहे जाने वाले व्यक्ति ने आगे चलकर पाकिस्तान की स्थापना का नेतृत्व किया?
गांधी के जिन्ना कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं देता। घटनाओं का क्रम— 1916 का लखनऊ समझौता, 1920 का नागपुर अधिवेशन, 1935 में जिन्ना की वापसी और 1947 का विभाजन— पाठक के सामने रखा जाता है। इसके बाद पाठक स्वयं गांधी की भूमिका का मूल्यांकन कर सकता है।
1916— जिन्ना हिंदू-मुस्लिम एकता के दूत और लखनऊ समझौते के निर्माता थे। 1920— गांधी ने नागपुर में खिलाफत गठबंधन को कांग्रेस की दिशा बनाया। जिन्ना ने इसका विरोध किया और कांग्रेस छोड़ दी। 1920-1924— खिलाफत प्रयोग ने व्यापक मुस्लिम राजनीतिक पहचान को संगठित किया। 1935— जिन्ना उसी संगठित आधार के साथ मुस्लिम लीग का नेतृत्व करने लौटे। 1947— पाकिस्तान अस्तित्व में आया। अभियोजन घटनाओं का यह क्रम पाठक के सामने रखता है। पाठक स्वयं विचार करे कि इस परिवर्तन में गांधी की भूमिका क्या थी और 1916 का लखनऊ समझौता उस समय की किन संभावनाओं का संकेत देता था।
मुख्य चित्र: चित्र देखने के लिए यहां क्लिक करें।
वीडियो
शब्दावली
- लखनऊ समझौता (1916): कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच हुआ एक ऐतिहासिक राजनीतिक समझौता, जिसे हिंदू-मुस्लिम सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
- मुहम्मद अली जिन्ना: प्रारंभिक दौर में संवैधानिक राजनीति और हिंदू-मुस्लिम सहयोग के समर्थक नेता, जो बाद में पाकिस्तान के संस्थापक बने।
- हिंदू-मुस्लिम एकता के दूत: सरोजिनी नायडू द्वारा जिन्ना के लिए प्रयुक्त उपाधि, जो उनके प्रारंभिक राजनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाती है।
- खिलाफत आंदोलन: प्रथम विश्व युद्ध के बाद उस्मानी खलीफा के समर्थन में चला आंदोलन, जिसे गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा।
- पैन-इस्लामी राजनीतिक पहचान: विभिन्न मुस्लिम समुदायों को एक व्यापक धार्मिक-राजनीतिक पहचान के अंतर्गत संगठित करने की अवधारणा।
- नागपुर कांग्रेस अधिवेशन (1920): वह कांग्रेस अधिवेशन जिसमें गांधी की नीतियों और जिन्ना की संवैधानिक राजनीति के बीच निर्णायक मतभेद सामने आए।
- सत्याग्रह: गांधी द्वारा प्रतिपादित जनआंदोलन की पद्धति, जिसका जिन्ना ने राजनीतिक दृष्टि से विरोध किया था।
- चौदह सूत्र (Fourteen Points): 1929 में जिन्ना द्वारा प्रस्तुत संवैधानिक प्रस्तावों का समूह, जिसका उद्देश्य संयुक्त भारत में मुस्लिम राजनीतिक अधिकारों की सुरक्षा था।
- संवैधानिक राष्ट्रवाद: राजनीतिक परिवर्तन और अधिकारों की प्राप्ति के लिए विधिक तथा संवैधानिक प्रक्रियाओं पर आधारित दृष्टिकोण।
- पृथक निर्वाचन क्षेत्र: ऐसी निर्वाचन व्यवस्था जिसमें विभिन्न समुदाय अपने प्रतिनिधि अलग-अलग चुनते हैं।
- मुस्लिम राजनीतिक एकीकरण: इस श्रृंखला में प्रयुक्त अवधारणा, जो खिलाफत आंदोलन के दौरान विभिन्न मुस्लिम समूहों के राजनीतिक समेकन को दर्शाती है।
- गांधी का खिलाफत प्रयोग: इस श्रृंखला में प्रयुक्त प्रमुख पद, जो गांधी द्वारा खिलाफत आंदोलन को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने की नीति को संदर्भित करता है।
- दर्ज घटनाक्रम (Documented Sequence): इस श्रृंखला का प्रमुख विश्लेषणात्मक पद, जिसके अंतर्गत ऐतिहासिक घटनाओं को उपलब्ध अभिलेखों और साक्ष्यों के आधार पर क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
- अभियोजन का पक्ष: इस श्रृंखला की विश्लेषणात्मक शैली, जिसमें लेखक घटनाओं को प्रश्नों और अभिलेखीय साक्ष्यों के माध्यम से पाठक के समक्ष रखता है।
#Gandhi #Jinnah #Partition #Pakistan #Congress #Khilafat #History #India #Politics #Freedom #MuslimLeague #Tilak #Nationalism #HinduinfoPedia
Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)
Refer to Various Arks Referred to in the Blog
[Short URL https://hinduinfopedia.in/?p=27939]
