गांधी का कलकत्ता मतदान: चार संशोधन, चार अस्वीकृतियाँ (84)
भारत / GB
भाग 84: महात्मा गांधी के शांति प्रयास | श्रृंखला सूचकांक
ब्लॉग 83 में बताया गया था कि नेहरू रिपोर्ट ने 1927 के मद्रास समझौतों से पीछे हटते हुए मुस्लिम संवैधानिक सुरक्षा प्रावधानों को अस्वीकार कर दिया था। यह लेख दिसंबर 1928 के कलकत्ता सर्वदलीय सम्मेलन में उस महत्वपूर्ण क्षण की समीक्षा करता है, जब जिन्ना ने अपनी मांगों को घटाकर चार न्यूनतम संशोधनों तक सीमित किया और उन्हें औपचारिक मतदान के लिए प्रस्तुत किया।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!कलकत्ता सम्मेलन — दिसंबर 1928
दिसंबर 1928 में सर्वदलीय सम्मेलन कलकत्ता में नेहरू रिपोर्ट को अंतिम रूप देने के लिए आयोजित हुआ। मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित जिन्ना ने रिपोर्ट में चार विशिष्ट संशोधन प्रस्तावित किए।
गांधी का कलकत्ता मतदान इन संशोधनों को व्यापक राजनीतिक मांगों के रूप में नहीं, बल्कि एक संयुक्त स्वतंत्र भारत में मुस्लिम राजनीतिक भागीदारी के लिए आवश्यक न्यूनतम संवैधानिक आधार के रूप में प्रस्तुत करता है।
चार संशोधन
पहला संशोधन — केंद्रीय विधानमंडल में एक-तिहाई मुस्लिम प्रतिनिधित्व:
संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था में हिंदू बहुमत का प्रभाव स्वाभाविक रूप से अधिक रहता। जिन्ना का तर्क था कि एक-तिहाई प्रतिनिधित्व मुस्लिम उपस्थिति को केवल प्रतीकात्मक बनने से रोकेगा। यह प्रभुत्व की नहीं, बल्कि न्यूनतम राजनीतिक भागीदारी की मांग थी।
दूसरा संशोधन — बंगाल और पंजाब में जनसंख्या के अनुपात में सीट आरक्षण:
बंगाल और पंजाब मुस्लिम-बहुल प्रांत थे। जिन्ना चाहते थे कि इन प्रांतों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या संरचना के अनुरूप हो। उन्होंने अतिरिक्त प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व की मांग की।
तीसरा संशोधन — अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के बजाय प्रांतों को:
नेहरू रिपोर्ट अवशिष्ट संवैधानिक शक्तियाँ केंद्र को देती थी। जिन्ना ने संघीय व्यवस्था के अनुरूप प्रस्ताव रखा कि जो शक्तियाँ स्पष्ट रूप से केंद्र को न दी जाएँ, वे प्रांतों के पास रहें। यही सिद्धांत कांग्रेस ने 1927 के मद्रास अधिवेशन में स्वीकार किया था।
चौथा संशोधन — सिंध को अलग प्रांत बनाना:
सिंध उस समय बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा था। अलग प्रांत बनने पर वहाँ का मुस्लिम बहुमत अपनी स्वतंत्र विधायी पहचान प्राप्त कर सकता था। यह मांग अंततः 1936 में पूरी हुई, किंतु तब तक वह संवैधानिक ढाँचा विफल हो चुका था जिसके भीतर जिन्ना समाधान खोज रहे थे।
मतदान और परिणाम
दिसंबर 1928 के कलकत्ता सम्मेलन में इन चारों संशोधनों पर औपचारिक मतदान हुआ।
चारों संशोधन अस्वीकृत कर दिए गए।
यह कोई अनौपचारिक निर्णय या मसौदे की चूक नहीं थी। संशोधन प्रस्तुत किए गए, उन पर चर्चा हुई, मतदान हुआ और वे पराजित हुए। जिन्ना का केवल एक प्रक्रियात्मक प्रस्ताव स्वीकार किया गया, जबकि मुस्लिम राजनीतिक सुरक्षा से जुड़े सभी प्रमुख प्रावधान अस्वीकृत रहे।
ब्लॉग 80 में वर्णित सांप्रदायिक दंगों की श्रृंखला इसी अवधि में चरम पर थी। खिलाफत आंदोलन के बाद उभरी संगठित मुस्लिम राजनीतिक पहचान अपने संवैधानिक स्थान की तलाश कर रही थी। ऐसे समय में जिन्ना द्वारा प्रस्तुत चार न्यूनतम सुरक्षा उपाय भी स्वीकार नहीं किए गए।
ब्लॉग 83 में वर्णित लेबनान का उदाहरण यहाँ उल्लेखनीय है। विभाजित समाजों में संरचनात्मक सुरक्षा व्यवस्थाएँ राजनीतिक स्थिरता का आधार बन सकती हैं। कलकत्ता मतदान यह दर्शाता है कि भारत में उस समय ऐसा मध्य मार्ग उपलब्ध होने के बावजूद स्वीकार नहीं किया गया।
यह मतदान क्या स्थापित करता है
गांधी का कलकत्ता मतदान एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य को रेखांकित करता है। जब जिन्ना ने अपनी मांगों को चार न्यूनतम संवैधानिक संशोधनों तक सीमित कर दिया, तब भी उन्हें औपचारिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से अस्वीकार कर दिया गया। इस प्रकार विवाद केवल मांगों की प्रकृति का नहीं, बल्कि उन मांगों को स्वीकार करने की राजनीतिक इच्छा का भी था।
नेहरू रिपोर्ट कांग्रेस के भीतर गांधी के उस प्रभावशाली नेतृत्व में तैयार हुई थी, जिसका वर्णन ब्लॉग 21 और ब्लॉग 22 में किया गया है। कलकत्ता सम्मेलन में जिन्ना द्वारा प्रस्तुत चार संशोधनों पर औपचारिक मतदान हुआ। परिणामस्वरूप चारों संशोधन अस्वीकृत कर दिए गए।
इसके बाद घटनाक्रम तेजी से आगे बढ़ा। कलकत्ता मतदान के पश्चात जिन्ना पुनः मुस्लिम लीग के शफी गुट के निकट आए और मार्च 1929 में अपने प्रसिद्ध चौदह सूत्र प्रस्तुत किए, जिन्हें भी स्वीकार नहीं किया गया, जैसा कि ब्लॉग 81 में वर्णित है। 1935 में जिन्ना पुनः मुस्लिम लीग के नेतृत्व में लौटे। 1940 तक वही राजनीतिक धारा पाकिस्तान की मांग तक पहुँच गई। गांधी का कलकत्ता मतदान इस पूरे क्रम में दिसंबर 1928 के उस क्षण को केंद्र में रखता है, जब चार न्यूनतम संवैधानिक सुरक्षा प्रस्ताव मतदान में अस्वीकृत हुए।

अभियोजन पक्ष का दृष्टिकोण
गांधी का कलकत्ता मतदान पाठकों के सामने तीन प्रश्न रखता है, जिनके उत्तर उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों से खोजे जा सकते हैं।
- क्या जिन्ना के चार संशोधन — केंद्रीय विधानमंडल में एक-तिहाई प्रतिनिधित्व, बंगाल और पंजाब में जनसंख्या अनुपात के अनुसार सीटें, अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों को तथा सिंध को अलग प्रांत बनाना — राजनीतिक प्रभुत्व की मांग नहीं बल्कि न्यूनतम संरचनात्मक सुरक्षा उपाय थे?
- क्या दिसंबर 1928 के कलकत्ता सर्वदलीय सम्मेलन में इन चारों प्रस्तावों पर औपचारिक लोकतांत्रिक मतदान हुआ और क्या चारों अस्वीकृत कर दिए गए?
- क्या कांग्रेस के भीतर व्यापक अधिकार रखने वाले गांधी ने इन चार न्यूनतम सुरक्षा प्रावधानों में से किसी को पारित कराने के लिए अपने अधिकार का उपयोग किया, अथवा परिणाम चार अस्वीकृतियाँ ही रहा?
गांधी का कलकत्ता मतदान इन प्रश्नों का अंतिम उत्तर नहीं देता। चारों संशोधन, मतदान का परिणाम और उस समय की राजनीतिक परिस्थितियाँ ऐतिहासिक अभिलेखों में दर्ज हैं। पाठक स्वयं इन तथ्यों का मूल्यांकन करें।
दिसंबर 1928, कलकत्ता। जिन्ना ने चार न्यूनतम संवैधानिक सुरक्षा प्रस्ताव रखे— केंद्रीय विधानमंडल में एक-तिहाई प्रतिनिधित्व, बंगाल और पंजाब में जनसंख्या अनुपात के अनुसार सीटें, अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों को और सिंध को अलग प्रांत का दर्जा। चारों प्रस्ताव मतदान में गए। चारों अस्वीकृत हुए। यह मतदान उस ऐतिहासिक क्रम का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया, जिसकी दिशा आने वाले वर्षों में और स्पष्ट होती गई।
मुख्य चित्र: चित्र देखने के लिए यहां क्लिक करें।
वीडियो
शब्दावली
- सर्वदलीय सम्मेलन (All Parties Conference): दिसंबर 1928 में कलकत्ता में आयोजित राजनीतिक सम्मेलन, जिसमें नेहरू रिपोर्ट पर विचार और निर्णय किए गए।
- नेहरू रिपोर्ट (Nehru Report): 1928 में तैयार संवैधानिक मसौदा, जिसे भारत के लिए स्वशासन संबंधी प्रस्तावों के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
- संयुक्त निर्वाचन प्रणाली (Joint Electorate System): ऐसी चुनाव व्यवस्था जिसमें सभी समुदायों के मतदाता एक ही निर्वाचन क्षेत्र में मतदान करते हैं।
- एक-तिहाई प्रतिनिधित्व (One-Third Representation): केंद्रीय विधानमंडल में मुसलमानों के लिए कम से कम एक-तिहाई सीटों की जिन्ना द्वारा प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था।
- जनसंख्या-अनुपातिक प्रतिनिधित्व (Population-Proportionate Representation): प्रतिनिधित्व का सिद्धांत जिसके अनुसार किसी समुदाय को उसकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें मिलें।
- अवशिष्ट शक्तियाँ (Residual Powers): वे संवैधानिक अधिकार जो स्पष्ट रूप से केंद्र को न दिए गए हों और संघीय व्यवस्था में किसी स्तर की सरकार को प्राप्त हों।
- संघीय व्यवस्था (Federal System): शासन प्रणाली जिसमें शक्तियाँ केंद्र और प्रांतों/राज्यों के बीच विभाजित होती हैं।
- सिंध पृथक्करण (Sindh Separation): सिंध को बॉम्बे प्रेसिडेंसी से अलग कर स्वतंत्र प्रांत बनाने का प्रस्ताव, जिसे बाद में 1936 में लागू किया गया।
- बॉम्बे प्रेसिडेंसी (Bombay Presidency): ब्रिटिश भारत की एक प्रमुख प्रशासनिक इकाई, जिसमें एक समय सिंध भी सम्मिलित था।
- मुस्लिम लीग (Muslim League): भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक हितों का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रमुख राजनीतिक संगठन।
- शफी गुट (Shafi Faction): मुस्लिम लीग का वह धड़ा जिसका नेतृत्व सर मोहम्मद शफी कर रहे थे और जिसके साथ जिन्ना बाद में पुनः जुड़े।
- चौदह सूत्र (Fourteen Points): मार्च 1929 में जिन्ना द्वारा प्रस्तुत संवैधानिक मांगों का समूह, जिसे मुस्लिम राजनीतिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया गया।
- गांधी का कलकत्ता मतदान (Gandhi’s Calcutta Vote): इस श्रृंखला में प्रयुक्त विशिष्ट पद, जो दिसंबर 1928 के कलकत्ता सम्मेलन में जिन्ना के चार संशोधनों पर हुए औपचारिक मतदान को संदर्भित करता है।
- न्यूनतम संवैधानिक सुरक्षा प्रावधान (Minimum Constitutional Protections): इस ब्लॉग में प्रयुक्त प्रमुख पद, जो जिन्ना द्वारा प्रस्तावित चार संशोधनों को राजनीतिक भागीदारी के लिए आवश्यक न्यूनतम संवैधानिक सुरक्षा के रूप में वर्णित करता है।
- प्रलेखित मतदान (Documented Vote): श्रृंखला में प्रयुक्त शब्द, जिसका आशय ऐतिहासिक अभिलेखों और कार्यवाहियों में दर्ज औपचारिक मतदान से है।
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Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)
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