गांधी की क्षमादान असमानता: दो फाँसियाँ—दो प्रतिक्रियाएँ (77)
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भाग 77: महात्मा गांधी के शांति प्रयास | श्रृंखला अनुक्रमणिका
ब्लॉग 76 में गांधी द्वारा अहिंसा की अवधारणा के परिवर्तन का विवरण दिया गया था। उसमें व्यक्तिगत उत्तरदायित्व को सामूहिक दोष में बदलते हुए दिखाया गया था। यह लेख गांधी द्वारा क्षमादान के समर्थन से जुड़े दो अभिलेखित प्रसंगों को सामने रखता है और उनके स्वरूप तथा तीव्रता की तुलना करता है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!प्रकरण एक—अब्दुल रशीद, 1927
अब्दुल रशीद ने 23 दिसंबर 1926 को अस्वस्थ अवस्था में रोगशय्या पर पड़े स्वामी श्रद्धानंद को निकट से दो गोलियाँ मारीं। उस पर मुकदमा चला, उसे दोषी ठहराया गया और मृत्युदंड दिया गया।
गांधी का समर्थन तत्काल, सार्वजनिक और बिना किसी शर्त के था।
यंग इंडिया, 30 दिसंबर 1926: “मैं अब्दुल रशीद के लिए निवेदन करना चाहता हूँ। मैं नहीं जानता कि वह कौन है। मुझे यह भी महत्त्वपूर्ण नहीं लगता कि उसने यह कार्य क्यों किया। दोष हमारा है।”
गुवाहाटी कांग्रेस अधिवेशन, 25 दिसंबर 1926—सीडब्ल्यूएमजी खंड 32, पृष्ठ 461-62: “मैं उसे स्वामीजी की हत्या का दोषी भी नहीं मानता।”
मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद गांधी ने अब्दुल रशीद को फाँसी दिए जाने का विरोध किया। यह समर्थन उनके अपने प्रकाशन और कांग्रेस अधिवेशन के अभिलेखों में स्पष्ट रूप से उपस्थित है।
प्रकरण दो—भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, 1931
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी की हत्या के प्रकरण में विशेष न्यायाधिकरण द्वारा मृत्युदंड दिया गया। 23 मार्च 1931 को उन्हें फाँसी दी गई।
अभिलेख बताते हैं कि गांधी ने दंड परिवर्तन का प्रयास किया। उन्होंने 18 फरवरी को वायसराय इरविन से यह विषय उठाया। इसके बाद 19, 20, 21 और 22 मार्च को उनसे भेंट की। 23 मार्च की सुबह भी उन्होंने व्यक्तिगत पत्र लिखा।
अभिलेख यह भी दर्शाते हैं कि 31 जनवरी 1931 को गांधी ने कहा था—सीडब्ल्यूएमजी खंड 40, पृष्ठ 133: “जिन्हें मृत्युदंड दिया गया है, उन्हें केवल फाँसी से ही नहीं बचाया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें कारागार से भी मुक्त किया जाना चाहिए। परंतु यह मेरा व्यक्तिगत मत है और मैं इसे किसी शर्त के रूप में नहीं रखना चाहता।”
5 मार्च 1931 को हुए गांधी-इरविन समझौते में भगत सिंह, राजगुरु या सुखदेव के संबंध में कोई प्रावधान नहीं था। समझौते और फाँसी के बीच अठारह दिन का अंतर था।
भगत सिंह ने विद्यार्थी को प्रताप में मंच उपलब्ध कराया था। इसका उल्लेख ब्लॉग 71 में किया गया है। विद्यार्थी 9 मार्च को इसी समझौते के अंतर्गत मुक्त हुए। भगत सिंह को 23 मार्च को फाँसी दी गई। विद्यार्थी का 25 मार्च को निधन हुआ। जिस समझौते ने विद्यार्थी को मुक्त किया, वह भगत सिंह को नहीं बचा सका। साथ ही गांधी ने अभिलेखित रूप से कहा था कि वे दंड परिवर्तन को समझौते की शर्त नहीं बनाना चाहते थे।
अभिलेखित असमानता
गांधी की क्षमादान असमानता इन दोनों प्रसंगों को एक तुलनात्मक रूप में प्रस्तुत करती है। एक पक्ष में बिना शर्त सार्वजनिक समर्थन दिखाई देता है। दूसरे पक्ष में निजी प्रयास दिखाई देते हैं, जिन्हें स्वयं गांधी ने व्यक्तिगत मत बताया।
अब्दुल रशीद: बिना शर्त सार्वजनिक समर्थन। यंग इंडिया में लेख। कांग्रेस अधिवेशन में वक्तव्य। उसे दोषी न मानने का स्पष्ट कथन। फाँसी के विरोध का सार्वजनिक अभिलेख।
भगत सिंह: वायसराय के साथ अनेक अभिलेखित बैठकें। फाँसी के दिन व्यक्तिगत पत्र। दंड परिवर्तन को व्यक्तिगत मत बताने वाला वक्तव्य। ऐसा समझौता जिसमें दंड परिवर्तन का कोई प्रावधान नहीं था।
गांधी की क्षमादान असमानता इस भिन्नता का अर्थ निर्धारित नहीं करती। यह केवल दोनों प्रसंगों की अभिलेखित प्रस्तुति पाठक के सामने रखती है—एक में सार्वजनिक और बिना शर्त समर्थन, दूसरे में निजी और सीमित समर्थन। इसके बाद अंतर का मूल्यांकन पाठक पर छोड़ दिया जाता है।

“प्लीड” का विधिक अर्थ
गांधी की क्षमादान असमानता पाठक के सामने एक विशेष शब्द रखती है।
यंग इंडिया, 30 दिसंबर 1926: “मैं अब्दुल रशीद के लिए निवेदन करना चाहता हूँ।”
विधिक संदर्भ में “प्लीड” का अर्थ है किसी व्यक्ति की ओर से न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष उसका पक्ष रखना। गांधी उस व्यक्ति की ओर से सार्वजनिक रूप से पक्ष प्रस्तुत कर रहे थे जिसने स्वामी श्रद्धानंद को उनकी शय्या पर गोली मारी थी।
अब्दुल रशीद ने एक व्यक्ति की हत्या की थी। वह व्यक्ति एक हिन्दू धार्मिक नेता था। वह अस्वस्थ था। उसकी आयु सत्तर वर्ष थी। घटना उसके अपने कक्ष में हुई थी।
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को एक ब्रिटिश अधिकारी की हत्या के लिए मृत्युदंड दिया गया था। यह कार्य उस लाठी-प्रहार की प्रतिक्रिया में किया गया था जिसके परिणामस्वरूप लाला लाजपत राय की मृत्यु हुई थी। लाला लाजपत राय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख राष्ट्रवादी नेताओं में से थे। अभिलेख बताते हैं कि उनका लक्ष्य वह व्यक्ति नहीं था जिसकी मृत्यु हुई, बल्कि वह अधिकारी था जिसने लाठी-प्रहार का आदेश दिया था।
जलियाँवाला बाग की घटना पर गांधी की अभिलेखित प्रतिक्रिया भी उल्लेखनीय है। यह वही घटना थी जिसने उस राजनीतिक वातावरण को आकार दिया जिसमें आगे चलकर भगत सिंह सक्रिय हुए। यंग इंडिया, 14 जुलाई 1920, सीडब्ल्यूएमजी खंड 18, पृष्ठ 46 में गांधी ने लिखा कि जनरल डायर के विरुद्ध व्यक्त क्रोध का बड़ा भाग उचित दिशा में नहीं था।
जिस व्यक्ति ने एक हिन्दू धार्मिक नेता की हत्या की, उसके लिए गांधी ने सार्वजनिक रूप से पक्ष रखा। जिन व्यक्तियों ने राष्ट्रवादी नेतृत्व पर हुए प्राणघातक प्रहार की प्रतिक्रिया में एक ब्रिटिश अधिकारी की हत्या की, उनके संबंध में गांधी ने इसे अपना व्यक्तिगत मत बताया और उसे वार्ता की शर्त नहीं बनाया।
गांधी के अपने शब्द क्या स्थापित करते हैं
गांधी की क्षमादान असमानता का आधार केवल गांधी के अपने अभिलेखित वक्तव्य हैं।
अब्दुल रशीद के विषय में गांधी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वे उसे नहीं जानते। उन्होंने कहा कि इस कार्य के पीछे क्या कारण था, यह उनके लिए महत्त्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने कहा कि दोष हमारा है। उन्होंने मृत्युदंड का विरोध किया। राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने अब्दुल रशीद को अपना भाई भी कहा।
भगत सिंह के विषय में गांधी का अभिलेखित मत सीडब्ल्यूएमजी खंड 40, पृष्ठ 133 में मिलता है। वहाँ उन्होंने कहा कि दंड परिवर्तन उनका व्यक्तिगत मत है और वे इसे किसी शर्त के रूप में नहीं रखना चाहते। इसके बाद समझौता हुआ। समझौते में दंड परिवर्तन का कोई प्रावधान नहीं था। अठारह दिन बाद भगत सिंह को फाँसी दे दी गई।
यह प्रस्तुति किसी निष्कर्ष को आरोपित नहीं करती। दोनों प्रसंगों में गांधी के अपने शब्द ही प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं।
अभियोजन का पक्ष
गांधी की क्षमादान असमानता अभिलेखित सामग्री को चार प्रश्नों के रूप में पाठक के सामने रखती है। इनका उत्तर उद्धृत प्राथमिक स्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है।
- क्या गांधी ने अब्दुल रशीद के समर्थन को बिना शर्त सार्वजनिक अभिलेख का भाग बनाया था—अपने प्रकाशन में और राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन में?
- क्या गांधी ने अभिलेखित रूप से कहा था कि भगत सिंह के लिए उनका समर्थन उनका व्यक्तिगत मत था और वे उसे किसी शर्त के रूप में नहीं रखना चाहते थे?
- क्या गांधी-इरविन समझौते में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के दंड परिवर्तन का कोई प्रावधान था, या समझौते और फाँसी के बीच अठारह दिन का अंतर था?
- क्या दोनों प्रसंगों की प्रस्तुति में दिखाई देने वाला अंतर—एक में सार्वजनिक और बिना शर्त, दूसरे में सीमित और निजी—गांधी के क्षमादान समर्थन के स्वरूप के विषय में कोई संकेत देता है?
गांधी की क्षमादान असमानता इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देती। प्राथमिक स्रोत हैं: सीडब्ल्यूएमजी खंड 32, सीडब्ल्यूएमजी खंड 40, यंग इंडिया 30 दिसंबर 1926, और गांधी-इरविन समझौते का अभिलेखित पाठ।
इसके साथ Pakistan or the Partition of India में डॉ. भीमराव आंबेडकर का अभिलेखित मूल्यांकन भी रखा जाता है। उसमें उन्होंने लिखा कि गांधी हिन्दू-मुस्लिम एकता को बनाए रखने के प्रति अत्यधिक चिंतित थे और कुछ हिन्दुओं की हत्या को उन्होंने निर्णायक प्रश्न नहीं माना। इसके बाद पाठक इन सभी स्रोतों का परीक्षण कर स्वयं निष्कर्ष निकाल सकता है।
अब्दुल रशीद—एक सत्तर वर्षीय हिन्दू धार्मिक नेता को उसकी शय्या पर गोली मारने के कारण मृत्युदंड प्राप्त व्यक्ति। गांधी: बिना शर्त सार्वजनिक समर्थन, यंग इंडिया में लेख, कांग्रेस अधिवेशन में वक्तव्य, और उसे दोषी न मानने का स्पष्ट कथन। भगत सिंह—एक ब्रिटिश अधिकारी की हत्या के कारण मृत्युदंड प्राप्त व्यक्ति। गांधी: यह मेरा व्यक्तिगत मत है और मैं इसे किसी शर्त के रूप में नहीं रखना चाहता। समझौता हुआ। अठारह दिन बाद भगत सिंह को फाँसी दे दी गई। अभियोजन दोनों अभिलेखित प्रसंगों को पाठक के समक्ष रखता है।
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शब्दावली
- क्षमादान असमानता (Clemency Asymmetry): इस ब्लॉग में प्रयुक्त अवधारणा, जो अब्दुल रशीद और भगत सिंह प्रकरणों में गांधी के अभिलेखित क्षमादान समर्थन के भिन्न स्वरूपों की तुलना करती है।
- क्षमादान (Clemency): मृत्युदंड या अन्य दंड को कम करने, बदलने या निरस्त करने का अनुरोध अथवा निर्णय।
- दंड परिवर्तन (Commutation): किसी कठोर दंड, विशेषकर मृत्युदंड, को कम कठोर दंड में परिवर्तित करना।
- प्लीड (Plead): किसी व्यक्ति की ओर से न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष उसका पक्ष रखना या उसके समर्थन में निवेदन करना।
- सीडब्ल्यूएमजी (CWMG – Collected Works of Mahatma Gandhi): महात्मा गांधी के लेखों, भाषणों, पत्रों और अभिलेखित वक्तव्यों का आधिकारिक संकलन।
- यंग इंडिया (Young India): गांधी द्वारा संपादित और प्रकाशित साप्ताहिक पत्र, जिसमें उनके विचार और सार्वजनिक वक्तव्य प्रकाशित होते थे।
- गांधी-इरविन समझौता (Gandhi-Irwin Pact): 5 मार्च 1931 को गांधी और वायसराय इरविन के बीच हुआ राजनीतिक समझौता।
- वायसराय (Viceroy): ब्रिटिश शासनकाल में भारत में ब्रिटिश सम्राट का सर्वोच्च प्रतिनिधि।
- अभिलेखित साक्ष्य (Documented Record): लिखित, प्रकाशित या आधिकारिक स्रोतों में दर्ज प्रमाण और वक्तव्य।
- स्वामी श्रद्धानंद: आर्य समाज के प्रमुख नेता और हिन्दू समाज सुधारक, जिनकी 1926 में अब्दुल रशीद द्वारा हत्या की गई।
- लाला लाजपत राय: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता, जिनकी मृत्यु लाठी-प्रहार के बाद हुई।
- जलियाँवाला बाग प्रसंग: 1919 की वह घटना जिसमें ब्रिटिश सैनिकों ने निहत्थे भारतीयों पर गोलीबारी की, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा को प्रभावित किया।
- व्यक्तिगत मत (Personal Opinion): ऐसा दृष्टिकोण जिसे व्यक्ति अपना निजी विचार बताए और जिसे औपचारिक शर्त के रूप में न रखे।
- सार्वजनिक समर्थन (Public Advocacy): किसी व्यक्ति या विषय के समर्थन को खुले रूप से सार्वजनिक मंचों या प्रकाशनों में प्रस्तुत करना।
- प्राथमिक स्रोत (Primary Sources): मूल अभिलेख, भाषण, पत्र, प्रकाशन या दस्तावेज जिन पर ऐतिहासिक विश्लेषण आधारित होता है।
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Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)
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