गांधी का अहमदाबाद प्रस्ताव: वह अधिवेशन जिसने नरमी दिखाई, औचित्य दिया और दोष स्थानांतरित किया (70)
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भाग 70: महात्मा गांधी के शांति प्रयास | श्रृंखला सूचकांक
ब्लॉग 69 में बताया गया था कि गांधी ने मुस्लिम मैत्री की कसौटी से सार्वजनिक निंदा को हटा दिया था। उस लेख में यह भी दिखाया गया था कि खिलाफत नेतृत्व ने उसके बाद क्या किया। यह लेख दिसंबर 1921 के अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन की एक घटना का अध्ययन करता है। उस समय मोपला हिंसा अपने उग्र चरण में थी। अधिवेशन में गांधी की निर्णायक पकड़ थी। उसी मंच पर तीन घटनाएँ साथ हुईं— निंदा प्रस्ताव को लगभग निष्प्रभावी बना दिया गया, हसरत मोहानी ने नरसंहार का औचित्य प्रस्तुत किया, और कांग्रेस ने दोष ब्रिटिश शासन पर रखा। गांधी पूरे समय उपस्थित थे।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!अधिवेशन— दस्तावेजों में विवरण
गांधी के अहमदाबाद प्रस्ताव को समझने के लिए दिसंबर 1921 के कांग्रेस अधिवेशन के तथ्यों को देखना आवश्यक है। यह लेख उन्हीं परिणामों को पाठकों के सामने रखता है।
यह अधिवेशन 24 से 26 दिसंबर 1921 तक चला। गांधी उस अधिवेशन की प्रमुख और निर्णायक शक्ति माने जाते थे। कांग्रेस, खिलाफत सम्मेलन और मुस्लिम लीग— तीनों बड़े राजनीतिक संगठनों ने अपने वार्षिक अधिवेशन अहमदाबाद में साथ आयोजित किए। कांग्रेस अधिवेशन में गांधी का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता था।
इसी अधिवेशन में गांधी ने हसरत मोहानी के पूर्ण स्वतंत्रता प्रस्ताव का विरोध किया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से उसके विरुद्ध तर्क रखे। अंततः वह प्रस्ताव पराजित हो गया। अहमदाबाद अधिवेशन में गांधी की भूमिका सक्रिय, प्रभावशाली और परिणाम देने वाली दिखाई देती है।
उसी अधिवेशन में मोपला प्रश्न पर भी तीन प्रमुख परिणाम सामने आए। यह लेख उन तीनों घटनाओं को क्रम से प्रस्तुत करता है।
पहला परिणाम— निंदा प्रस्ताव को कमजोर किया गया
24 दिसंबर 1921 को अधिवेशन में हिंदू सदस्यों ने मोपलाओं द्वारा हिंदुओं पर किए गए अत्याचारों की निंदा का प्रस्ताव रखा। इसके बाद जो घटनाएँ हुईं, उनका विवरण स्वामी श्रद्धानंद ने अपने प्रत्यक्ष विवरण में दिया। यह विवरण 26 अगस्त 1926 को ‘द लिबरेटर’ में प्रकाशित हुआ था। अनेक ऐतिहासिक स्रोत भी इसकी पुष्टि करते हैं।
मूल प्रस्ताव में हिंदुओं की हत्या, घरों को जलाने और बलपूर्वक धर्मांतरण के लिए मोपलाओं की सामूहिक निंदा की गई थी। बाद में संशोधनों के बाद प्रस्ताव को सीमित कर दिया गया। अंततः केवल कुछ व्यक्तियों की निंदा तक बात रह गई। इसके बाद मौलाना हसरत मोहानी ने इस सीमित प्रस्ताव का भी विरोध किया।
मोहानी का मत यह था कि मोपला क्षेत्र ‘दार-उल-हरब’ बन चुका था। उनके अनुसार मालाबार के अंग्रेजी-शिक्षित हिंदुओं ने शत्रु का साथ दिया था।
इसी आधार पर उन्होंने कहा कि मोपलाओं द्वारा हिंदुओं के सामने कुरान और तलवार रखना उचित था। उनके अनुसार धर्मांतरण स्वेच्छा से हुए थे।
अंततः यह निंदा प्रस्ताव पारित नहीं हुआ। पहले ही इसे काफी सीमित किया जा चुका था।
गांधी पूरे समय उपस्थित थे। इसी अधिवेशन में उन्होंने यह भी दिखाया था कि जिस प्रस्ताव का वे विरोध करते थे, उसे प्रभावी हस्तक्षेप से रोक सकते थे। हसरत मोहानी का पूर्ण स्वतंत्रता प्रस्ताव इसका उदाहरण था। किंतु मोपला निंदा प्रस्ताव के विषय में उन्होंने ऐसी भूमिका नहीं निभाई।
दूसरा परिणाम— कांग्रेस द्वारा पारित प्रस्ताव
मोपला प्रश्न पर कांग्रेस ने जो प्रस्ताव पारित किया, उसका पाठ ऐतिहासिक अभिलेखों में उपलब्ध है। उसमें कहा गया था:
“कांग्रेस का दृढ़ मत है कि मोपला उपद्रव असहयोग अथवा खिलाफत आंदोलन के कारण नहीं हुआ। यह घटना तब नहीं होती यदि अहिंसा का संदेश वहाँ तक पहुँचने दिया जाता।”
इस प्रस्ताव में दोष ब्रिटिश प्रशासन पर रखा गया। कहा गया कि प्रशासन ने असहयोग आंदोलन के नेताओं को मालाबार जाने की अनुमति नहीं दी। यही दृष्टिकोण गांधी ने अपने व्यक्तिगत वक्तव्यों में भी व्यक्त किया था। इसका उल्लेख ब्लॉग 63 और ब्लॉग 64 में दर्ज है।
इतिहासकार डॉ. आर. सी. मजूमदार ने इस प्रस्ताव पर अपनी टिप्पणी लिखी। उन्होंने लिखा:
“यह प्रस्ताव ऐसे बड़े राष्ट्रीय संगठन के योग्य नहीं था जिसने पंजाब अत्याचारों के विरोध में असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया था। मोपला अत्याचारों की भीषणता पंजाब के मार्शल लॉ काल की घटनाओं से कहीं अधिक थी।”
अहमदाबाद में पारित प्रस्ताव में नरसंहार की निंदा नहीं की गई। उसमें कहा गया कि हिंसा के लिए खिलाफत-असहयोग गठबंधन उत्तरदायी नहीं था। प्रस्ताव ने दोष औपनिवेशिक प्रशासन पर डाला।

तीसरा परिणाम— गांधी का चयनात्मक हस्तक्षेप
गांधी का अहमदाबाद प्रस्ताव पाठकों के सामने एक महत्वपूर्ण तुलना रखता है। उसी अधिवेशन, उसी दिन और उसी अध्यक्षीय व्यवस्था के भीतर गांधी की दो अलग भूमिकाएँ दर्ज हैं।
1. स्वतंत्रता प्रस्ताव पर:
- गांधी की भूमिका: गांधी स्वयं उठे और दर्ज रूप में संयमित तर्कों के साथ प्रस्ताव का विरोध किया।
- विरोध का विषय: मौलाना हसरत मोहानी की तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को रोका गया।
- परिणाम: प्रस्ताव पराजित हुआ और इसमें गांधी का प्रत्यक्ष राजनीतिक हस्तक्षेप प्रभावी सिद्ध हुआ।
2. मोपला निंदा प्रस्ताव पर:
- गांधी की भूमिका: गांधी अधिवेशन में उपस्थित रहे, किंतु प्रस्ताव को क्रमशः कमजोर किए जाने के दौरान मौन रहे।
- विरोध का विषय: मौलाना हसरत मोहानी द्वारा नरसंहार के समर्थन में दिए गए सार्वजनिक तर्कों का कोई प्रतिवाद नहीं किया गया।
- परिणाम: प्रस्ताव छोड़ दिया गया और वह पारित नहीं हो सका।
यह लेख गांधी की मंशा पर कोई निष्कर्ष प्रस्तुत नहीं करता। यह केवल दो स्थितियों को साथ रखता है— एक सक्रिय और प्रभावी, दूसरी अनुपस्थित। दोनों घटनाएँ उसी अधिवेशन और उसी अध्यक्षीय व्यवस्था में हुईं।
अहमदाबाद अधिवेशन का अभिलेख एक और तथ्य सामने रखता है। अक्टूबर 1921 में गांधी ने हिंदुओं से कहा था कि मुस्लिम मैत्री की कसौटी केवल सार्वजनिक असहमति नहीं है। दिसंबर 1921 के अहमदाबाद अधिवेशन में कांग्रेस ने वही स्थिति प्रस्तुत की— न स्पष्ट असहमति, न नरसंहार की निंदा, बल्कि ऐसा प्रस्ताव जिसने हिंसा के कारणों से गठबंधन को अलग किया और दोष ब्रिटिश प्रशासन पर डाला। गांधी ने जिसे मैत्री की वास्तविक कसौटी नहीं माना था, कांग्रेस ने उनके अध्यक्षीय प्रभाव में वही परिणाम प्रस्तुत किया। गांधी का अहमदाबाद प्रस्ताव उसी परिणाम का विवरण है।
अभियोजन पक्ष की स्थिति
गांधी का अहमदाबाद प्रस्ताव यह दावा नहीं करता कि गांधी ने निंदा प्रस्ताव को कमजोर कराया। यह लेख केवल अधिवेशन का विवरण पाठकों के सामने रखता है— तीन परिणाम, दो हस्तक्षेप और एक अध्यक्षीय नेतृत्व। इसी आधार पर यह चार प्रश्न प्रस्तुत करता है।
- क्या अहमदाबाद अधिवेशन में गांधी ने यह दिखाया कि उनके पास कांग्रेस की कार्यवाही को प्रभावी रूप से प्रभावित करने की क्षमता थी— विशेष रूप से मोहानी के स्वतंत्रता प्रस्ताव को पराजित करके?
- क्या गांधी ने उसी प्रभाव का उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए किया कि मोपला निंदा प्रस्ताव पारित हो, अथवा इस विषय पर उनका व्यवहार मौन रहा?
- क्या कांग्रेस द्वारा पारित प्रस्ताव ने खिलाफत-असहयोग गठबंधन की भूमिका से इंकार करते हुए दोष ब्रिटिश प्रशासन पर डाला— और क्या यह गांधी के व्यक्तिगत वक्तव्यों से मेल खाता था, जिनका उल्लेख ब्लॉग 63 और 64 में है?
- उस अधिवेशन का क्या अर्थ निकाला जाए जिसने मोपला नरसंहार की निंदा पारित नहीं की, किंतु ऐसा प्रस्ताव पारित किया जिसने गठबंधन की भूमिका से इंकार किया और दोष औपनिवेशिक प्रशासन पर डाला?
यह श्रृंखला इन प्रश्नों का प्रत्यक्ष उत्तर नहीं देती। अधिवेशन का विवरण दर्ज है। उसी अधिवेशन में गांधी के दो अलग प्रकार के हस्तक्षेप दिखाई देते हैं। पाठक दोनों को देखेंगे और अपना निष्कर्ष स्वयं निकालेंगे।
24-26 दिसंबर 1921। अहमदाबाद। गांधी उस अधिवेशन की स्वीकृत निर्णायक शक्ति थे। उन्होंने मोहानी के स्वतंत्रता प्रस्ताव का विरोध किया और वह प्रस्ताव पराजित हो गया। लगभग 2,500 हिंदुओं की मृत्यु से जुड़े निंदा प्रस्ताव को क्रमशः कमजोर किया गया। मोहानी ने नरसंहार का समर्थन किया और प्रस्ताव पारित नहीं हुआ। अंततः जो प्रस्ताव पारित हुआ, उसने गठबंधन की भूमिका से इंकार किया और दोष ब्रिटिश प्रशासन पर डाला। गांधी पूरे समय उपस्थित थे। गांधी का अहमदाबाद प्रस्ताव पाठकों के सामने उसके दस्तावेजी रूप में रखा गया है। अब पाठक देखेंगे कि अध्यक्ष के चयनात्मक हस्तक्षेप का अभिलेख क्या दर्शाता है।
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शब्दावली
- मोपला हिंसा: 1921 में मालाबार क्षेत्र में हुई हिंसक घटनाएँ, जिनमें अनेक हिंदुओं की हत्या, संपत्ति विनाश और बलपूर्वक धर्मांतरण के आरोप दर्ज हुए।
- अहमदाबाद अधिवेशन: दिसंबर 1921 में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन, जिसमें कांग्रेस, खिलाफत सम्मेलन और मुस्लिम लीग के अधिवेशन समान समय पर हुए।
- खिलाफत आंदोलन: प्रथम विश्वयुद्ध के बाद उस्मानी खिलाफत के समर्थन में चला राजनीतिक-धार्मिक आंदोलन, जिसे भारत में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन से जोड़ा था।
- असहयोग आंदोलन: महात्मा गांधी के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन के विरोध में चलाया गया राष्ट्रव्यापी आंदोलन, जिसमें सरकारी संस्थाओं और व्यवस्थाओं के बहिष्कार का आह्वान किया गया।
- हसरत मोहानी: स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े राजनीतिक नेता और कवि, जिन्होंने अहमदाबाद अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता की मांग रखी तथा मोपला घटनाओं पर विवादित मत प्रस्तुत किया।
- दार-उल-हरब: इस्लामी राजनीतिक अवधारणा, जिसका अर्थ ऐसा क्षेत्र माना जाता है जहाँ इस्लामी शासन न हो और जिसे संघर्ष क्षेत्र के रूप में देखा जाए।
- मोपला निंदा प्रस्ताव: अहमदाबाद अधिवेशन में प्रस्तुत वह प्रस्ताव जिसमें मोपला हिंसा और अत्याचारों की निंदा की मांग की गई थी।
- चयनात्मक हस्तक्षेप: इस श्रृंखला में प्रयुक्त अभिव्यक्ति, जिसका अर्थ है कि किसी नेता द्वारा एक विषय पर सक्रिय हस्तक्षेप करना, जबकि दूसरे समान महत्व के विषय पर मौन रहना।
- कारणों की श्रृंखला: इस ब्लॉग श्रृंखला में प्रयुक्त अभिव्यक्ति, जो उन घटनाओं और निर्णयों के क्रम को दर्शाती है जिन्हें लेखक हिंसा की पृष्ठभूमि से जोड़ता है।
- डॉ. आर. सी. मजूमदार: भारतीय इतिहासकार, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और मोपला घटनाओं पर विस्तृत ऐतिहासिक टिप्पणी लिखी।
- मालाबार: वर्तमान केरल का ऐतिहासिक क्षेत्र, जहाँ 1921 की मोपला हिंसा हुई थी।
- औपनिवेशिक प्रशासन: ब्रिटिश शासनकाल की प्रशासनिक व्यवस्था, जिसे कांग्रेस प्रस्ताव में मोपला हिंसा के लिए उत्तरदायी बताया गया।
- पूर्ण स्वतंत्रता प्रस्ताव: हसरत मोहानी द्वारा प्रस्तुत वह प्रस्ताव जिसमें ब्रिटिश शासन से तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की गई थी।
- अभियोजन पक्ष: इस श्रृंखला में प्रयुक्त विश्लेषणात्मक शैली, जिसमें घटनाओं और वक्तव्यों को प्रश्नों तथा साक्ष्यों के रूप में पाठकों के सामने रखा जाता है।
- सार्वजनिक निंदा की कसौटी: इस श्रृंखला में प्रयुक्त अभिव्यक्ति, जिसका आशय यह प्रश्न है कि क्या किसी हिंसक घटना के बाद सार्वजनिक विरोध या निंदा को वास्तविक मैत्री या समर्थन की परीक्षा माना जाना चाहिए।
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Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)
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