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गांधी की वर्धा पराजय: अक्टूबर 1939 में गांधी और पटेल के मत की अस्वीकृति (94)

भारत / GB

भाग 94: महात्मा गांधी के शांति प्रयास | श्रृंखला अनुक्रमणिका

ब्लॉग 93 में अक्टूबर 1939 में प्रांतीय मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र को लेकर गांधी की अपनी आशंकाओं का दस्तावेजी विवरण प्रस्तुत किया गया था। गांधी का मानना था कि इससे मुस्लिम लीग को बल मिलेगा और ब्रिटिश शासन को युद्धकाल में अधिक स्वतंत्रता प्राप्त होगी। यह लेख बताता है कि वह निर्णय कैसे लिया गया और उस प्रक्रिया में गांधी की स्थिति क्या थी।

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वर्धा बैठक — दस्तावेजों में दर्ज तथ्य

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक 22–23 अक्टूबर 1939 को वर्धा में हुई। इसका उद्देश्य वायसराय द्वारा भारत को बिना परामर्श युद्ध में शामिल करने और 17 अक्टूबर के उसके वक्तव्य पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया तय करना था। वायसराय लिनलिथगो ने 3 सितंबर 1939 को किसी निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधि या प्रांतीय सरकार से परामर्श किए बिना भारत को युद्धरत घोषित कर दिया था।

कांग्रेस ने प्रारम्भिक प्रस्ताव में जर्मन आक्रमण की निंदा की थी। साथ ही कहा था कि परामर्श के बिना भारत युद्ध प्रयासों से स्वयं को नहीं जोड़ सकता। 17 अक्टूबर के वायसराय वक्तव्य को कांग्रेस ने अपर्याप्त माना। उसमें केवल परामर्शदात्री समिति का प्रस्ताव था, जबकि कांग्रेस युद्ध के बाद स्वतंत्रता के स्पष्ट आश्वासन की अपेक्षा कर रही थी।

गांधी की वर्धा पराजय इस बैठक का दस्तावेजी विवरण प्रस्तुत करती है। आठ प्रांतीय मंत्रिमंडलों का त्यागपत्र गांधी का व्यक्तिगत निर्णय नहीं था। यह कार्यसमिति का निर्णय था, जहाँ विभिन्न मत थे और अंततः एक पक्ष की राय स्वीकार की गई।

दस्तावेजों में दर्ज पक्ष-विन्यास

उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार गांधी और सरदार पटेल ब्रिटिश शासन के विरुद्ध युद्ध के प्रश्न पर असहयोग और मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र के पक्ष में नहीं थे। दूसरी ओर जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस का समाजवादी समूह त्यागपत्र का समर्थन कर रहा था तथा उसी पर बल दे रहा था।

10 अक्टूबर 1939 के कार्यसमिति प्रस्ताव से यह मतभेद स्पष्ट हो चुका था। उसमें कहा गया था कि परामर्श के बिना भारत युद्ध से स्वयं को नहीं जोड़ सकता। परंतु यह स्पष्ट नहीं था कि प्रतिक्रिया केवल विरोध होगी या त्यागपत्र भी दिया जाएगा।

इससे पहले कांग्रेस ने युद्ध के प्रश्न पर मुस्लिम लीग के साथ संयुक्त दृष्टिकोण बनाने का प्रयास किया था। जिन्ना को सितंबर 1939 की कार्यसमिति बैठक में आमंत्रित किया गया, लेकिन उन्होंने भाग नहीं लिया। बाद में नेहरू ने उनसे अलग से भेंट की। एक बैठक गांधी की उपस्थिति में भी हुई। दोनों पक्षों के बीच कुछ समान दृष्टिकोण उभरने की बात दर्ज की गई है। 17 अक्टूबर को वायसराय द्वारा कांग्रेस की मांगों को अस्वीकार करने के बाद यह प्रयास समाप्त हो गया।

गांधी की वर्धा पराजय अभिलेखों में दर्ज स्थिति को यथावत प्रस्तुत करती है। गांधी और पटेल त्यागपत्र के विरोध में थे। नेहरू और समाजवादी समूह इसके समर्थन में थे। अंततः त्यागपत्र का निर्णय कार्यसमिति में वामपंथी धड़े की विजय के रूप में दर्ज हुआ।

गांधी के अपने शब्दों का क्रम

गांधी की वर्धा पराजय में घटनाओं का क्रम विशेष महत्व रखता है। उपलब्ध अभिलेख बताते हैं कि गांधी की आशंका मतदान से पहले ही दर्ज थी।

गांधी का मत था कि मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र से मुस्लिम लीग को बल मिलेगा और ब्रिटिश शासन भारत में सैन्य गतिविधियों को अधिक स्वतंत्रता से आगे बढ़ा सकेगा। यह विचार निर्णय के बाद की व्याख्या नहीं था। यह निर्णय लिए जाने से पहले व्यक्त की गई आशंका थी।

17 अक्टूबर के वायसराय वक्तव्य पर गांधी की प्रतिक्रिया भी दर्ज है। उन्होंने कहा था, “फूट डालो और शासन करो की पुरानी नीति जारी रहेगी। कांग्रेस ने रोटी मांगी थी और उसे पत्थर मिला।”

वायसराय के व्यवहार पर ऐसी कठोर टिप्पणी करने के बाद भी गांधी ने त्यागपत्र की उस नीति का समर्थन नहीं किया जिसे कार्यसमिति के अधिकांश सदस्यों ने स्वीकार किया था।

निर्णय गांधी के मत के विरुद्ध गया। कार्यसमिति के निर्णय के बाद कांग्रेस उच्च नेतृत्व के निर्देश पर 22 अक्टूबर 1939 को प्रांतीय मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद जो परिणाम सामने आए, वे भी अभिलेखों में दर्ज हैं। वायसराय लिनलिथगो और मुहम्मद अली जिन्ना दोनों ने इन त्यागपत्रों पर संतोष व्यक्त किया। लगभग दस सप्ताह बाद जिन्ना ने 22 दिसंबर को “मुक्ति दिवस” घोषित किया। इसकी चर्चा ब्लॉग 93 में की गई है।

अभिलेखों से क्या स्थापित होता है

गांधी की वर्धा पराजय पाठक के सामने एक महत्वपूर्ण तथ्य प्रस्तुत करती है। यह तथ्य इस श्रृंखला में पहले वर्णित कांग्रेस पर गांधी के प्रभाव से अलग है।

इस श्रृंखला के ब्लॉग 21-22 तथा अन्य लेखों में ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं जहाँ गांधी ने कांग्रेस के निर्णयों पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाला। 1922 का चौरी-चौरा प्रकरण इसका एक उदाहरण है। उस अवसर पर गांधी ने आंदोलन के बड़े हिस्से की असहमति के बावजूद अपना निर्णय लागू कराया था। उस निर्णय का आधार उनका व्यक्तिगत प्रभाव था, न कि कार्यसमिति का मतदान।

अक्टूबर 1939 का त्यागपत्र प्रकरण इससे भिन्न था। अभिलेख बताते हैं कि कार्यसमिति में गांधी पराजित पक्ष में थे। नेहरू और समाजवादी समूह उनके विरोध में थे। सरदार पटेल गांधी के साथ खड़े थे।

यह अंतर महत्वपूर्ण है। गांधी द्वारा स्वयं लिया गया निर्णय और गांधी द्वारा विरोध किए जाने के बावजूद पारित निर्णय एक समान नहीं हैं। बाद में दोनों की आलोचना हुई हो, तब भी उनका स्वरूप अलग है। अक्टूबर 1939 का त्यागपत्र दूसरे प्रकार का उदाहरण है। यह एक दर्ज आंतरिक पराजय थी, न कि निर्विवाद नियंत्रण का प्रदर्शन।

मुक्ति दिवस

गांधी का मुक्ति दिवस
दिसंबर 1939 में त्यागपत्रों के परिणामों पर गांधी का अपना वक्तव्य — यहाँ दर्ज मतदान के साथ पढ़ें।

विश्लेषण पढ़ें →

अभियोजन पक्ष की स्थिति

गांधी की वर्धा पराजय पाठक के सामने तीन प्रश्न रखती है।

  • क्या गांधी ने वर्धा में कार्यसमिति के मतदान से पहले ही मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र का विरोध किया था और उसके परिणामों की चेतावनी दी थी, जिससे वह बाद की व्याख्या नहीं बल्कि पहले से दर्ज पूर्वानुमान सिद्ध होता है?
  • क्या वर्धा का निर्णय गांधी और पटेल के मत के विरुद्ध गया था तथा नेहरू और कांग्रेस के समाजवादी समूह ने उसे पारित कराया था, जिससे त्यागपत्र गांधी के प्रत्यक्ष नियंत्रण का निर्णय नहीं बल्कि एक दर्ज आंतरिक पराजय सिद्ध होता है?
  • क्या मतदान के बाद सामने आए परिणाम — वायसराय और जिन्ना का संतोष तथा “मुक्ति दिवस” के आसपास लीग का संगठित होना — उसी दिशा में गए जिसकी आशंका गांधी ने मतदान से पहले व्यक्त की थी?

यह श्रृंखला इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देती। वर्धा की कार्यवाही, गांधी का मतदान-पूर्व वक्तव्य और त्यागपत्रों के बाद के दर्ज परिणाम पाठक के सामने रखे गए हैं। घटनाक्रम का मूल्यांकन पाठक स्वयं करेगा और निष्कर्ष स्वयं निकालेगा।

22-23 अक्टूबर 1939, वर्धा। गांधी और पटेल मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र के विरोध में थे। नेहरू और समाजवादी समूह उसके समर्थन में थे और उनकी राय स्वीकार हुई। गांधी की आशंका थी कि त्यागपत्र से मुस्लिम लीग को बल मिलेगा और ब्रिटिश शासन को युद्धकाल में अधिक स्वतंत्रता प्राप्त होगी। यह आशंका मतदान से पहले व्यक्त की गई थी। त्यागपत्र पारित हो गया। वायसराय और जिन्ना ने संतोष व्यक्त किया। अभियोजन पक्ष मतदान और उसके परिणामों का यह दर्ज विवरण पाठक के सामने रखता है। अंतिम निष्कर्ष पाठक स्वयं निकालेगा।

मुख्य चित्र: चित्र देखने के लिए यहां क्लिक करें।

वीडियो

शब्दावली

  1. वर्धा बैठक: अक्टूबर 1939 में वर्धा में आयोजित कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक, जिसमें ब्रिटिश युद्ध नीति और कांग्रेस मंत्रिमंडलों के भविष्य पर निर्णय लिया गया।
  2. कांग्रेस कार्यसमिति (Congress Working Committee): कांग्रेस का सर्वोच्च नीति-निर्धारण निकाय, जो महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय लेने के लिए उत्तरदायी था।
  3. वायसराय लिनलिथगो: 1936 से 1943 तक भारत के ब्रिटिश वायसराय, जिन्होंने सितंबर 1939 में भारत को बिना भारतीय सहमति के द्वितीय विश्वयुद्ध में शामिल घोषित किया।
  4. प्रांतीय मंत्रिमंडल त्यागपत्र: अक्टूबर 1939 में कांग्रेस द्वारा संचालित आठ प्रांतीय सरकारों का सामूहिक त्यागपत्र।
  5. मुस्लिम लीग: मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाला राजनीतिक संगठन, जिसने बाद में पाकिस्तान की मांग का नेतृत्व किया।
  6. मुक्ति दिवस (Day of Deliverance): 22 दिसंबर 1939 को जिन्ना द्वारा घोषित दिवस, जिसे कांग्रेस मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र के स्वागत के रूप में मनाया गया।
  7. कांग्रेस समाजवादी समूह: कांग्रेस के भीतर सक्रिय समाजवादी विचारधारा वाला गुट, जिसने 1939 में मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र का समर्थन किया।
  8. कांग्रेस का वामपक्ष (Congress Left): कांग्रेस के भीतर समाजवादी और वाम झुकाव वाले नेताओं का समूह, जिसने वर्धा निर्णय में प्रमुख भूमिका निभाई।
  9. असहयोग: ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग न करने की राजनीतिक नीति, जिसका स्वरूप और सीमा 1939 में विवाद का विषय थी।
  10. युद्ध प्रयास (War Effort): द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा संचालित सैन्य और प्रशासनिक अभियान, जिसमें भारत को स्वतः शामिल किया गया।
  11. दस्तावेजी अभिलेख: उस समय के आधिकारिक प्रस्ताव, पत्राचार, वक्तव्य और कार्यवाही विवरण, जिनके आधार पर ऐतिहासिक निष्कर्ष निकाले जाते हैं।
  12. वर्धा पराजय: इस ब्लॉग श्रृंखला में प्रयुक्त विशिष्ट पद, जो अक्टूबर 1939 की उस स्थिति को दर्शाता है जिसमें गांधी कार्यसमिति के निर्णय में अल्पमत में रह गए।
  13. चौरी-चौरा प्रकरण: 1922 की घटना जिसके बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय लिया था।
  14. एकतरफा अधिकार: ऐसी स्थिति जिसमें किसी नेता का प्रभाव संगठनात्मक निर्णयों को बिना व्यापक समर्थन के भी लागू करा सके।
  15. कार्यसमिति मतदान: कांग्रेस कार्यसमिति के भीतर विभिन्न मतों के आधार पर लिया गया औपचारिक निर्णय।

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Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)

Refer to Various Arks Referred to in the Blog

Gandhi Prosecution Exhibits Master Table

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