जिन्ना से गांधी का अलगाव: मतभेद से पाकिस्तान प्रस्ताव तक (95)
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भाग 95: महात्मा गांधी के शांति प्रयास | श्रृंखला सूचकांक
ब्लॉग 94 में वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति के निर्णय और उसके बाद सामने आए अभिलेखीय परिणामों का विवरण दिया गया था— जिसमें वायसराय और जिन्ना दोनों संतुष्ट दिखाई दिए तथा मुस्लिम लीग अधिक सशक्त होकर उभरी। यह लेख उस क्रम को पूरा करता है। इसमें वर्ष 1920 में खिलाफत आंदोलन पर जिन्ना की आपत्ति से लेकर वर्ष 1928 में हुए अलगाव और मार्च 1940 के लाहौर प्रस्ताव तक की घटनाओं का संक्षिप्त अभिलेखीय विवरण प्रस्तुत किया गया है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!जिन्ना ने अभी क्या नहीं छोड़ा था
जिन्ना से गांधी के अलगाव को समझने से पहले एक महत्वपूर्ण तथ्य देखना आवश्यक है। जिन्ना की आपत्ति वर्ष 1920 में शुरू हुई थी। नागपुर अधिवेशन में उन्होंने गांधी और खिलाफत आंदोलन के गठबंधन का विरोध किया था। इसी कारण उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र दिया था।
फिर भी उस समय उन्होंने संवैधानिक मार्ग नहीं छोड़ा था। उन्नीस सौ तीस के दशक के मध्य तक अनेक मुस्लिम नेता भारत के संघीय ढांचे के भीतर राजनीतिक सुरक्षा चाहते थे। उनका उद्देश्य भारत से अलग होना नहीं था।
भारत शासन अधिनियम 1935 के अंतर्गत पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की मांग भी इसी सोच का भाग थी। इसका उद्देश्य साझा संवैधानिक व्यवस्था के भीतर सुरक्षा प्राप्त करना था।
जिन्ना के वर्ष 1929 के चौदह सूत्र भी इसी आधार पर बने थे। इनका विवरण ब्लॉग 81 में दिया गया है। उनका मुख्य विचार एकीकृत भारत के भीतर प्रांतीय अधिकारों की रक्षा था।
अभिलेख यह नहीं दिखाते कि जिन्ना वर्ष 1920 या 1928 में ही विभाजन के समर्थक बन चुके थे। अभिलेख यह दर्शाते हैं कि उन्होंने पहले आपत्ति उठाई, फिर कई वर्षों तक संवैधानिक समाधान खोजने का प्रयास किया। विभिन्न समझौता प्रस्ताव बार-बार प्रस्तुत किए गए, परंतु उन्हें बार-बार अस्वीकार किया गया। इसका विवरण ब्लॉग 81, ब्लॉग 84 और ब्लॉग 85 में उपलब्ध है। यह लेख इसी परिवर्तन की पड़ताल करता है कि वर्ष 1920 की आपत्ति बीस वर्ष बाद लाहौर की मांग तक कैसे पहुंची।
वर्ष 1937 का निर्णायक मोड़
वर्ष 1937 के प्रांतीय चुनावों का विवरण ब्लॉग 86 में दिया गया है। इन चुनावों के बाद मुस्लिम लीग किसी भी मुस्लिम-बहुल प्रांत में सरकार नहीं बना सकी। 482 मुस्लिम सीटों में से लीग को 106 सीटें मिलीं। पंजाब में यूनियनिस्ट दल ने सरकार बनाई। सिंध में निर्दलीय नेताओं के गठबंधन ने शासन संभाला। उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में खान बंधुओं के नेतृत्व में कांग्रेस समर्थित सरकार बनी।
इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व ने अपने प्रांतों पर मजबूत नियंत्रण रखा। लीग नेतृत्व ने इसे इस संकेत के रूप में देखा कि यदि केंद्र में कांग्रेस का प्रभुत्व हुआ तो मुस्लिम-बहुल प्रांतों की स्थिति कैसी होगी।
ब्लॉग 88 और ब्लॉग 89 इस काल की महत्वपूर्ण घटनाओं का विवरण देते हैं। इनमें लीग के विलय जैसी शर्तों वाले गठबंधन प्रस्ताव तथा लीग के समर्थकों तक सीधे पहुंचने का कांग्रेस अभियान शामिल था।
अभिलेखों के अनुसार इस अभियान का परिणाम कांग्रेस की अपेक्षा से भिन्न निकला। इससे लीग कमजोर नहीं हुई। इसके विपरीत जिन्ना की नाराजगी बढ़ी। इसी अवधि में पंजाब, बंगाल और असम के प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं का समर्थन लीग को मिलने लगा। वर्ष 1940 के लाहौर अधिवेशन में यही समर्थन निर्णायक सिद्ध हुआ।
लाहौर प्रस्ताव: अभिलेखीय विवरण
बाईस से चौबीस मार्च 1940 के बीच अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में आयोजित हुआ। मिंटो पार्क में आयोजित इस सभा में लगभग एक लाख लोगों की उपस्थिति का अनुमान लगाया गया।
जिन्ना ने लगभग दो घंटे का अध्यक्षीय भाषण अंग्रेजी में दिया। उन्होंने तर्क रखा कि हिंदू और मुस्लिम एक ही राष्ट्र के भीतर केवल बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदाय नहीं हैं। उनके अनुसार दोनों अलग-अलग राष्ट्र हैं। उन्होंने धर्म, सामाजिक परंपराओं, साहित्य और ऐतिहासिक प्रेरणाओं के आधार पर यह मत प्रस्तुत किया।
जिन्ना ने इस प्रश्न को आंतरिक विषय नहीं, बल्कि दो राष्ट्रों के बीच का विषय बताया।
प्रस्ताव का प्रारंभिक मसौदा पंजाब के मुख्यमंत्री सर सिकंदर हयात खान ने तैयार किया था। बाद में जिन्ना की अध्यक्षता वाली विषय समिति ने उसमें संशोधन किए। बंगाल के प्रधानमंत्री ए. के. फजलुल हक ने इसे अधिवेशन में प्रस्तुत किया। संयुक्त प्रांत के चौधरी खालिकुज्जमां, पंजाब के जफर अली खान, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के सरदार औरंगजेब खान, कश्मीर के पीर जियाउद्दीन अंद्राबी और सिंध के सर अब्दुल्ला हारून ने इसका समर्थन किया।
प्रस्ताव में कहा गया कि कोई भी संवैधानिक योजना तब तक स्वीकार्य नहीं होगी, जब तक उत्तर-पश्चिम और पूर्व के भौगोलिक रूप से जुड़े मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों को स्वतंत्र राज्यों के रूप में संगठित न किया जाए।
प्रस्ताव के मूल पाठ में “पाकिस्तान” शब्द नहीं था। प्रस्ताव में “राज्यों” शब्द का प्रयोग किया गया था, जो बहुवचन में था। बाद के इतिहासकारों ने इस अस्पष्टता पर चर्चा की। कुछ ने इसे मसौदे का अनसुलझा प्रश्न माना। अन्य विद्वानों ने इसे इस संकेत के रूप में देखा कि लीग अभी एकल राष्ट्र की अवधारणा पर पूरी तरह सहमत नहीं हुई थी। अभिलेखों के अनुसार “पाकिस्तान” नाम सबसे पहले समकालीन हिंदू समाचार पत्रों ने इस प्रस्ताव के साथ जोड़ा था, न कि मुस्लिम लीग ने।
पूरा अभिलेखीय क्रम
जिन्ना से गांधी के अलगाव का यह अध्ययन पाठक के सामने पूरे बीस वर्ष का क्रम रखता है। वर्ष 1920 में नागपुर अधिवेशन हुआ। जिन्ना ने खिलाफत गठबंधन का विरोध किया और कांग्रेस छोड़ दी। वर्ष 1928 में कलकत्ता में दोनों पक्षों के मार्ग अलग हुए। इसका विवरण ब्लॉग 85 में दिया गया है।
वर्ष 1929 में चौदह सूत्र प्रस्तुत किए गए, परंतु उन्हें स्वीकार नहीं किया गया। वर्ष 1930 से 1934 के बीच जिन्ना लंदन में रहे और इस अवधि में लीग अपेक्षाकृत निष्क्रिय रही। वर्ष 1935 में जिन्ना भारत लौटे।
वर्ष 1937 में चुनाव हुए। मुस्लिम लीग किसी भी मुस्लिम-बहुल प्रांत में सरकार नहीं बना सकी। इसके बाद कांग्रेस ने गठबंधन की ऐसी शर्तें रखीं जिनमें लीग के विलय की अपेक्षा शामिल थी। इसी अवधि में जनसंपर्क अभियान भी चलाया गया।
वर्ष 1939 में वर्धा का मतदान हुआ। इसके बाद मंत्रालयों ने त्यागपत्र दिए और मुक्ति दिवस मनाया गया। इन घटनाओं का विवरण ब्लॉग 93 तथा ब्लॉग 94 में उपलब्ध है। वर्ष 1940 में लाहौर प्रस्ताव सामने आया।
यह श्रृंखला अब इस पूरे क्रम के प्रत्येक अभिलेखीय चरण को प्रस्तुत कर चुकी है। जिन्ना से गांधी का अलगाव इस क्रम की अंतिम कड़ी के रूप में रखा गया है।

अभियोजन पक्ष का दृष्टिकोण
जिन्ना से गांधी के अलगाव का यह अध्ययन पाठक के सामने तीन प्रश्न रखता है।
- क्या अभिलेखीय प्रमाण दिखाते हैं कि उन्नीस सौ तीस के दशक के मध्य तक जिन्ना एकीकृत भारत के भीतर राजनीतिक सुरक्षा चाहते थे और वर्ष 1920 या 1928 में विभाजन के प्रति प्रतिबद्ध नहीं थे?
- क्या वर्ष 1937 की घटनाएं— लीग का चुनावी पराजय का सामना करना, उसके विलय की अपेक्षा रखने वाली गठबंधन शर्तें और उसके समर्थकों को लक्ष्य बनाने वाला जनसंपर्क अभियान— लीग के व्यापक जनाधार वाले आंदोलन में बदलने से पहले और उसके साथ-साथ घटित हुईं?
- क्या लाहौर प्रस्ताव की अस्पष्ट भाषा— “राज्यों” शब्द का प्रयोग तथा “पाकिस्तान” नाम का अभाव— यह संकेत देती है कि मांग अभी विकसित हो रही थी और यह इसी अभिलेखीय क्रम का परिणाम थी?
यह श्रृंखला इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देती। ब्लॉग 81 से 94 तक का पूरा अभिलेखीय क्रम पाठक के सामने रखा गया है। अब पाठक स्वयं उसका अध्ययन कर निष्कर्ष निकालेगा।
बचाव पक्ष के लिए आमंत्रण
अब मंच बचाव पक्ष के लिए खुला है। हम उन्हें अपने प्रमाण प्रस्तुत करने और अभियोजन पक्ष द्वारा रखे गए विवरण को चुनौती देने के लिए आमंत्रित करते हैं।
वर्ष 1920: नागपुर, आपत्ति और त्यागपत्र। वर्ष 1928: मार्गों का अलग होना। वर्ष 1929: चौदह सूत्र, अस्वीकृत। वर्ष 1937: मुस्लिम-बहुल प्रांतों में पराजय, फिर वापसी की शर्त के रूप में विलय का प्रस्ताव। वर्ष 1939: वर्धा, त्यागपत्र और मुक्ति दिवस। वर्ष 1940: लाहौर— एक नहीं, दो राष्ट्र; “राज्यों” की अवधारणा, अभी “राज्य” नहीं। बीस वर्ष का यह क्रम अभिलेखों में चरण-दर-चरण दर्ज है। अभियोजन पक्ष ने यह पूरा क्रम पाठक के सामने रखा है। अब आगे का निष्कर्ष पाठक स्वयं निकालेगा।
मुख्य चित्र: चित्र देखने के लिए यहां क्लिक करें।
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शब्दावली
- नागपुर अधिवेशन (1920): कांग्रेस का वह अधिवेशन जहाँ जिन्ना ने गांधी के खिलाफत आंदोलन से गठबंधन का विरोध किया और बाद में कांग्रेस छोड़ दी।
- खिलाफत आंदोलन: प्रथम विश्वयुद्ध के बाद उस्मानी खलीफा के समर्थन में चलाया गया आंदोलन, जिसका गांधी ने असहयोग आंदोलन के साथ समर्थन किया।
- संवैधानिक मार्ग: राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विधिक और प्रतिनिधिक संस्थाओं के माध्यम से कार्य करने की नीति।
- चौदह सूत्र (Fourteen Points): वर्ष 1929 में जिन्ना द्वारा प्रस्तुत राजनीतिक प्रस्ताव, जिनका उद्देश्य एकीकृत भारत में मुस्लिम समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा था।
- पृथक निर्वाचन क्षेत्र: ऐसी निर्वाचन व्यवस्था जिसमें विशेष समुदाय अपने प्रतिनिधियों का चुनाव अलग मतदाता सूची से करता है।
- भारत शासन अधिनियम 1935: ब्रिटिश शासन द्वारा लागू किया गया प्रमुख संवैधानिक अधिनियम, जिसने प्रांतीय स्वशासन का विस्तृत ढाँचा प्रदान किया।
- मास कॉन्टैक्ट प्रोग्राम: वर्ष 1937 के बाद कांग्रेस द्वारा मुस्लिम समाज तक सीधे पहुँचने के लिए चलाया गया जनसंपर्क अभियान।
- मुस्लिम लीग: ब्रिटिश भारत में मुस्लिम राजनीतिक हितों का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रमुख राजनीतिक संगठन।
- लाहौर प्रस्ताव (1940): अखिल भारतीय मुस्लिम लीग द्वारा पारित प्रस्ताव, जिसमें मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए स्वतंत्र राज्यों की मांग की गई।
- मिंटो पार्क: लाहौर का वह स्थान जहाँ मार्च 1940 में मुस्लिम लीग का ऐतिहासिक अधिवेशन आयोजित हुआ।
- वर्धा निर्णय: अक्टूबर 1939 में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा लिया गया निर्णय, जिसने बाद की राजनीतिक घटनाओं को प्रभावित किया।
- मुक्ति दिवस (Day of Deliverance): कांग्रेस मंत्रालयों के त्यागपत्र के बाद मुस्लिम लीग द्वारा 22 दिसंबर 1939 को मनाया गया दिवस।
- दो-राष्ट्र सिद्धांत: वह राजनीतिक विचार जिसके अनुसार हिंदू और मुस्लिम अलग-अलग राष्ट्र माने गए।
- पाकिस्तान प्रश्न: लाहौर प्रस्ताव के बाद विकसित हुई राजनीतिक अवधारणा, जिसमें मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के पृथक राजनीतिक भविष्य पर चर्चा हुई।
- जिन्ना से गांधी का अलगाव: इस श्रृंखला में प्रयुक्त प्रमुख अवधारणा, जो 1920 से 1940 के बीच गांधी और जिन्ना के राजनीतिक मार्गों के क्रमिक विभाजन को दर्शाती है।
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Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)
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