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गांधी का वियोग दिवस: मंत्रालय काल का अंत और गांधी की प्रतिक्रिया (93)

भारत / GB

भाग 93: महात्मा गांधी के शांति प्रयास | श्रृंखला अनुक्रमणिका

ब्लॉग 92 में पीरपुर प्रतिवेदन का अभिलेखीय विवरण प्रस्तुत किया गया था, जिसमें 1937–1939 के दौरान कांग्रेस मंत्रालयों के शासन के विरुद्ध मुस्लिम लीग की दर्ज शिकायतें संकलित थीं। यह लेख मंत्रालय काल के अंत का अभिलेखीय विवरण प्रस्तुत करता है तथा इस प्रसंग पर गांधी के दिनांकित वक्तव्यों को पाठकों के सामने रखता है।

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त्यागपत्र — अभिलेखीय विवरण

3 सितंबर 1939 को वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों से परामर्श किए बिना भारत को जर्मनी के विरुद्ध युद्धरत घोषित कर दिया। कांग्रेस ने इस एकपक्षीय घोषणा का विरोध किया। 22 अक्टूबर 1939 को कांग्रेस कार्यसमिति ने सभी कांग्रेस मंत्रालयों को त्यागपत्र देने का आह्वान किया।

आठ प्रांतों में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया। अभिलेखों के अनुसार जवाहरलाल नेहरू इस निर्णय के पक्ष में थे, जबकि महात्मा गांधी अपेक्षाकृत कम उत्साहित थे। गांधी को आशंका थी कि इससे मुस्लिम लीग की स्थिति सुदृढ़ होगी तथा ब्रिटिश शासन को युद्धकाल में भारत के सैन्यीकरण के लिए अधिक स्वतंत्रता मिल जाएगी। अभिलेख यह भी दर्शाते हैं कि वायसराय और जिन्ना दोनों इस परिणाम से संतुष्ट थे। गांधी की आशंकाओं के अनुरूप ही परिणाम सामने आया।

गांधी का वियोग दिवस इस तथ्य को प्रारंभ में ही पाठकों के सामने रखता है कि जिन्ना की प्रतिक्रिया से पहले ही गांधी इस निर्णय को लेकर संकोच व्यक्त कर चुके थे।

जिन्ना की घोषणा — अभिलेखीय विवरण

2 दिसंबर 1939 को जिन्ना ने भारतीय मुसलमानों से 22 दिसंबर को “वियोग दिवस” मनाने का आह्वान किया। उनके शब्दों में यह उस राहत का प्रतीक था कि कांग्रेस शासन अंततः समाप्त हो गया है। इससे पहले वायसराय ने गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष और जिन्ना को चर्चा के लिए आमंत्रित किया था। वायसराय का मत था कि कांग्रेस को प्रांतीय विषयों पर मुस्लिम लीग से मतभेद सुलझाने होंगे। जिन्ना ने वायसराय को संयुक्त ज्ञापन भेजने से इनकार कर दिया।

12 दिसंबर 1939 को गांधी ने व्यक्तिगत रूप से जिन्ना से यह आयोजन रद्द करने का आग्रह किया। गांधी का मत था कि इससे सामुदायिक सौहार्द को क्षति पहुँचेगी। जिन्ना ने यह आग्रह स्वीकार नहीं किया।

गांधी के अभिलेखीय शब्द

गांधी का वियोग दिवस गांधी के 14 दिसंबर 1939 के दिनांकित वक्तव्य को पाठकों के सामने प्रस्तुत करता है, जो nehruarchive.in में संरक्षित है।

गांधी ने लिखा कि यदि जिन्ना कांग्रेस के विरुद्ध उन आरोपों को दोहराते रहें जिन्हें गांधी अप्रमाणित मानते थे, तो उनके साथ वार्ता पुनः आरंभ करना उनके राष्ट्रवाद और आत्मसम्मान के विरुद्ध होगा। गांधी ने कहा कि मंत्रालयों ने त्यागपत्र किसी सामुदायिक विषय पर नहीं, बल्कि युद्ध संबंधी राजनीतिक कारणों से दिया था।

गांधी ने यह भी लिखा कि पिछले दो वर्षों में भारत का सामुदायिक प्रश्न एक अलग राजनीतिक दिशा में विकसित हुआ था। उन्होंने मंत्रालयों में लीग के प्रतिनिधित्व और गठबंधन निर्माण की मांगों का उल्लेख किया, परंतु उन्हें सामुदायिक विषय नहीं माना।

गांधी का वियोग दिवस इस वर्णन को बिना परिवर्तन प्रस्तुत करता है। दिसंबर 1939 के अपने शब्दों में गांधी ने लीग की उन गठबंधन संबंधी मांगों को, जिनका विवरण ब्लॉग 88, 89 और 90 में दिया गया है, राजनीतिक विषय के रूप में देखा। साथ ही उन्होंने लीग द्वारा बताए गए परिणामों को अप्रमाणित बताया। यह गांधी के वक्तव्य के भीतर एक उल्लेखनीय विरोधाभास के रूप में सामने आता है।

अभिलेखीय असमानता

गांधी का वियोग दिवस एक और अभिलेखीय तथ्य प्रस्तुत करता है। गांधी ने जिन्ना की शिकायतों को “अप्रमाणित आरोप” कहा। किंतु पीरपुर प्रतिवेदन के निष्कर्षों तथा कांग्रेस के अपने मुस्लिम जनसंपर्क कार्यालय द्वारा आंशिक रूप से पुष्ट तथ्यों, जैसा कि ब्लॉग 92 में स्थापित किया गया है, की विषयवस्तु पर गांधी ने 14 दिसंबर के वक्तव्य में प्रत्यक्ष चर्चा नहीं की।

गांधी की अभिलेखीय प्रतिक्रिया मुख्यतः त्यागपत्र के कारणों की व्याख्या तक सीमित रही। सूचीबद्ध शिकायतों के मूल विषयों पर उन्होंने विस्तार से विचार नहीं किया।


पीरपुर प्रतिवेदन

गांधी का पीरपुर प्रतिवेदन
वे अभिलेखीय शिकायतें जिन्हें गांधी ने दिसंबर 1939 के अपने वक्तव्य में “अप्रमाणित आरोप” कहा था।

विश्लेषण पढ़ें →

अभियोजन पक्ष का दृष्टिकोण

गांधी का वियोग दिवस पाठकों के समक्ष तीन प्रश्न प्रस्तुत करता है।

  • क्या गांधी ने 14 दिसंबर 1939 के अपने दिनांकित वक्तव्य में पीरपुर प्रतिवेदन की अभिलेखीय शिकायतों को “अप्रमाणित आरोप” बताया, जबकि उनके विशिष्ट विवरणों पर चर्चा नहीं की?
  • क्या गांधी के अपने शब्दों ने मुस्लिम लीग की गठबंधन संबंधी मांगों—जिनका विवरण ब्लॉग 88, 89 और 90 में प्रस्तुत है—को “गहरे राजनीतिक महत्व” का विषय बताया, जबकि उन्हें सामुदायिक विषय नहीं माना गया, यद्यपि लीग ने इसे राजनीतिक भागीदारी से वंचित किए जाने के रूप में अनुभव किया?
  • क्या मंत्रालयों के त्यागपत्र पर गांधी की प्रारंभिक आशंका—कि इससे लीग सुदृढ़ होगी—और बाद में दिसंबर 1939 में लीग की शिकायतों को अप्रमाणित बताना, लीग के अभिलेखीय पक्ष के प्रति एक सुसंगत दृष्टिकोण को दर्शाता है?

यह श्रृंखला इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देती। गांधी के अपने शब्द प्राथमिक स्रोत हैं और nehruarchive.in में संरक्षित हैं। पाठक गांधी के वक्तव्य और उस पीरपुर प्रतिवेदन का साथ-साथ अध्ययन करेंगे, जिसे उन्होंने अस्वीकार किया था, और फिर स्वयं निष्कर्ष निकालेंगे।

प्रतिरक्षा पक्ष के लिए आमंत्रण

अब हम प्रतिरक्षा पक्ष को आमंत्रित करते हैं कि वह अपने अभिलेखीय प्रमाण प्रस्तुत करे और अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत सामग्री का प्रत्यक्ष उत्तर दे।

14 दिसंबर 1939। गांधी के अपने शब्द: “कांग्रेस के विरुद्ध अप्रमाणित आरोप।” मंत्रालयों ने त्यागपत्र “किसी सामुदायिक विषय पर नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से” दिया था। सामुदायिक प्रश्न का “गहरा राजनीतिक महत्व” था, किंतु गांधी की व्याख्या में वह सामुदायिक विषय नहीं था। पीरपुर प्रतिवेदन की अभिलेखीय शिकायतों, जिनकी आंशिक पुष्टि कांग्रेस के अपने जनसंपर्क कार्यालय ने भी की थी, की विषयवस्तु पर प्रत्यक्ष चर्चा नहीं की गई। अभियोजन पक्ष गांधी के अपने दिनांकित शब्द पाठकों के सामने रखता है। निष्कर्ष पाठक स्वयं निकालेंगे।

मुख्य चित्र: चित्र देखने के लिए यहां क्लिक करें।

वीडियो

शब्दावली

  1. शब्दावली (Glossary of Terms)
  2. पीरपुर प्रतिवेदन (Pirpur Report): 1938 में मुस्लिम लीग द्वारा प्रकाशित शिकायतों का अभिलेखीय संकलन, जिसमें कांग्रेस मंत्रालयों के शासन से संबंधित आरोप और असंतोष दर्ज किए गए थे।
  3. मंत्रालय काल (Ministry Period): 1937 से 1939 के बीच विभिन्न प्रांतों में कांग्रेस मंत्रालयों के शासन का कालखंड।
  4. कांग्रेस कार्यसमिति (Congress Working Committee): भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सर्वोच्च नीति-निर्धारण समिति।
  5. वायसराय (Viceroy): ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में ब्रिटिश सम्राट का सर्वोच्च प्रतिनिधि।
  6. लॉर्ड लिनलिथगो (Lord Linlithgow): 1936 से 1943 तक भारत के वायसराय, जिन्होंने 1939 में भारत को जर्मनी के विरुद्ध युद्धरत घोषित किया।
  7. डे ऑफ डिलिवरेंस (Day of Deliverance): 22 दिसंबर 1939 को मुस्लिम लीग द्वारा मनाया गया दिवस, जिसे कांग्रेस मंत्रालयों के त्यागपत्र के उपरांत राहत के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया।
  8. सामुदायिक प्रश्न (Communal Question): भारत में विभिन्न धार्मिक समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अधिकारों से संबंधित विवाद।
  9. गठबंधन मांगें (Coalition Demands): मुस्लिम लीग द्वारा प्रांतीय मंत्रालयों में प्रतिनिधित्व और साझा शासन की मांग।
  10. मुस्लिम जनसंपर्क कार्यक्रम (Muslim Mass Contact Programme): कांग्रेस द्वारा मुस्लिम समाज तक प्रत्यक्ष राजनीतिक पहुँच बनाने का अभियान।
  11. अभिलेखीय विरोधाभास (Documented Contradiction): ऐसे तथ्य या वक्तव्य जिनमें अभिलेखीय स्रोतों के आधार पर परस्पर विरोधी स्थिति दिखाई देती हो।
  12. अप्रमाणित आरोप (Unproved Allegations): गांधी द्वारा मुस्लिम लीग की शिकायतों के संदर्भ में प्रयुक्त अभिव्यक्ति।
  13. राजनीतिक महत्व (Political Significance): किसी विषय का शासन, प्रतिनिधित्व या सत्ता-संतुलन पर प्रभाव।
  14. प्रांतीय प्रतिनिधित्व (Provincial Representation): प्रांतों की शासन व्यवस्था में विभिन्न राजनीतिक समूहों की भागीदारी।
  15. अभियोजन पक्ष (Prosecution): इस श्रृंखला की संरचना में वह पक्ष जो अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर प्रश्न प्रस्तुत करता है।
  16. प्रतिरक्षा पक्ष (Defence): वह पक्ष जिसे प्रस्तुत साक्ष्यों का उत्तर देने या वैकल्पिक व्याख्या रखने का अवसर दिया जाता है।

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Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)

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Gandhi Prosecution Exhibits Master Table

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