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गांधी का निरामंत्रित उदाहरण: वह व्यक्ति जिसे कभी निमंत्रण की आवश्यकता नहीं पड़ी — मालाबार तक (63)

भारत / GB

भाग 63: महात्मा गांधी के शांति प्रयास | श्रृंखला सूची

ब्लॉग 62 ने मोपला नरसंहार के समय गांधी के कथनों का समूह प्रस्तुत किया था। उसमें वह “लेकिन” भी था जिसने निंदा को निष्प्रभावी बना दिया। उसी में हत्यारों के प्रति प्रशंसा का आग्रह और हिंदुओं पर पहले से तय दोषारोपण भी था। यह लेख ब्लॉग 59 के पाँचवें कथन की समीक्षा करता है। गांधी ने दर्ज रूप में कहा था कि नरसंहार के लिए ब्रिटिश शासन उत्तरदायी था, क्योंकि उसने गांधी और अली बंधुओं को मालाबार जाकर स्थिति शांत करने के लिए आमंत्रित नहीं किया।

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कथन — सटीक संदर्भ में

गांधी के “अनचाहे उदाहरण” की शुरुआत मोपला नरसंहार पर पारित कांग्रेस प्रस्ताव से होती है। यह प्रस्ताव दिसंबर 1921 में अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में पारित हुआ था:

“The Congress expresses its firm conviction that the Moplah disturbance was not due to the Non-Co-operation or the Khilafat movement… and that the outbreak would not have occurred had the message of non-violence been allowed to reach them. Nevertheless, this Congress is of the opinion that the disturbance in Malabar could have been prevented by the Government of Madras accepting the proffered assistance of Maulana Yakub Hassan…”

गांधी के कालीकट भाषण और कांग्रेस प्रस्ताव का तर्क स्पष्ट था। उनके अनुसार नरसंहार रोका जा सकता था। ब्रिटिश शासन ने प्रस्तावित सहायता स्वीकार नहीं की। इसलिए नरसंहार की उत्तरदायित्व ब्रिटिश शासन पर था, क्योंकि उसने गांधी और खिलाफत नेतृत्व को हस्तक्षेप का अवसर नहीं दिया।

अभियोजन इस तर्क के साथ एक प्रश्न रखता है। गांधी के चार दशकों के सार्वजनिक जीवन में ऐसा कब हुआ था, जब उन्होंने कार्य करने से पहले ब्रिटिश निमंत्रण की प्रतीक्षा की हो?

गांधी का निरामंत्रित उदाहरण: सार्वजनिक जीवन इतिहास

गांधी का निरामंत्रित उदाहरण उनके सार्वजनिक जीवन की तुलना मालाबार में अपनाई गई निमंत्रण-आधारित शर्त से करता है।

दक्षिण अफ्रीका 1894: गांधी को नस्ली भेदभाव के विरुद्ध रुकने का निमंत्रण नहीं मिला था। उनके पास वापसी टिकट था। फिर भी वे रुके। उन्होंने नटाल इंडियन कांग्रेस बनाई। कोई ब्रिटिश निमंत्रण नहीं था।

भारत 1915: गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटकर भारतीय राजनीति में आए। ब्रिटिश शासन ने उन्हें न लौटने के लिए कहा था और न राजनीतिक गतिविधियों के लिए बुलाया था। बाल गंगाधर तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले का मार्गदर्शन भी ब्रिटिश निमंत्रण नहीं था।

चंपारण 1917: चंपारण का ब्रिटिश प्रशासन गांधी को नील किसानों की स्थिति की जाँच के लिए बुलाने नहीं गया था। गांधी बिना निमंत्रण पहुँचे। उन्होंने बिना निमंत्रण जाँच आरंभ की। उन्होंने बिना निमंत्रण ब्रिटिश प्रशासन से वार्ता की। अंततः समझौता हुआ। ब्लॉग 5 ने इसे विस्तार से दर्ज किया था।

रॉलेट सत्याग्रह 1919: गांधी ने रॉलेट एक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह बिना ब्रिटिश अनुमति के आरंभ किया। ब्रिटिश शासन ने उन्हें जन-आंदोलन चलाने के लिए नहीं बुलाया था।

असहयोग आंदोलन 1920: गांधी ने असहयोग आंदोलन बिना ब्रिटिश निमंत्रण आरंभ किया। यह आंदोलन सीधे ब्रिटिश इच्छा के विरुद्ध था। जिस आंदोलन से ब्रिटिश प्रशासन चिंतित हुआ, वह किसी निमंत्रण पर आधारित नहीं था।

नमक यात्रा 1930: गांधी 241 मील चलकर दांडी पहुँचे। ब्रिटिश शासन ने उन्हें नमक कानून तोड़ने के लिए आमंत्रित नहीं किया था। फिर भी वे गए।

सविनय अवज्ञा 1932: यह भी बिना ब्रिटिश निमंत्रण आरंभ हुआ।

भारत छोड़ो आंदोलन 1942: यह भी बिना ब्रिटिश निमंत्रण आरंभ हुआ।

चार दशकों का यह अभिलेख एक ही बात दिखाता है। गांधी ने अपने सार्वजनिक जीवन के किसी भी बड़े अभियान के लिए ब्रिटिश निमंत्रण की प्रतीक्षा नहीं की। वे जहाँ जाना चाहते थे, वहाँ गए। जो आंदोलन चलाना चाहते थे, उसे चलाया। जिस पक्ष से संवाद करना चाहते थे, उससे किया।

मालाबार वाला कथन क्या प्रकट करता है

गांधी का निरामंत्रित उदाहरण मालाबार वाले कथन को उनके इसी सार्वजनिक जीवन के सामने रखता है और पाठक से अंतर पर ध्यान देने को कहता है।

कांग्रेस प्रस्ताव में कहा गया था कि यदि ब्रिटिश शासन खिलाफत नेतृत्व की सहायता स्वीकार कर लेता, तो नरसंहार रोका जा सकता था। गांधी का दर्ज मत यह था कि उनकी और अली बंधुओं की उपस्थिति स्थिति शांत कर सकती थी।

वे गए नहीं।

चंपारण का उदाहरण उपलब्ध था। गांधी पहले ही दिखा चुके थे कि वे बिना ब्रिटिश निमंत्रण किसी संघर्ष क्षेत्र में जा सकते हैं, शिकायतें सुन सकते हैं और समाधान तक पहुँच सकते हैं। उन्होंने यह कार्य 1917 में किया था। वही पद्धति 1921 में भी उपलब्ध थी।

गांधी ने उसे लागू नहीं किया। उन्होंने निमंत्रण की प्रतीक्षा की। जब वह निमंत्रण नहीं आया, तब उन्होंने नरसंहार की उत्तरदायित्व ब्रिटिश शासन पर रखी।


Champaran

गांधी का ग्रामीण भारत: चंपारण — वास्तविक पीड़ा, वास्तविक सीमाएँ
बिना निमंत्रण पहुँचना गांधी की कार्यपद्धति का उदाहरण था। यही तथ्य मालाबार से उनकी दूरी के साथ स्पष्ट विरोध दिखाता है।

विश्लेषण पढ़ें →

अनजाने में हुआ स्वीकार

गांधी का निरामंत्रित उदाहरण इस कथन में छिपे उस संकेत को पहचानता है, जिसे गांधी स्वयं प्रकट करना नहीं चाहते थे।

गांधी ने कहा था कि उनकी और अली बंधुओं की उपस्थिति नरसंहार रोक सकती थी। इस कथन ने उसी कारण-श्रृंखला की पुष्टि कर दी, जिसे यह श्रृंखला मोपला घटनाक्रम में लगातार दर्ज करती आई है। अली बंधुओं का मोपला मुसलमानों के व्यवहार पर प्रभाव था। गांधी भी उसी प्रभाव तंत्र का भाग थे। यह प्रभाव खिलाफत गठबंधन से आया था। गांधी के कथन ने स्वयं यह स्वीकार कर दिया कि जिस गठबंधन का उन्होंने निर्माण किया था, उसी के पास उस हिंसा को रोकने की क्षमता भी थी, जो उसी गठबंधन के वातावरण में उत्पन्न हुई।

यह कथन ब्रिटिश शासन पर उत्तरदायित्व डालने के लिए दिया गया था। परंतु दर्ज रूप में इससे गांधी की अपनी समझ सामने आई। वे जानते थे कि जिस राजनीतिक साधन का उन्होंने उपयोग किया, उसी से यह हिंसा उत्पन्न हुई। वे जानते थे कि अली बंधुओं और उनके पास उसे रोकने की क्षमता थी। फिर भी उन्होंने ब्रिटिश निमंत्रण के बिना उस क्षमता का उपयोग नहीं किया।

मालाबार जाने की वास्तविक कीमत

गांधी का निरामंत्रित उदाहरण एक और प्रश्न उठाता है। जिस व्यक्ति को कभी निमंत्रण की आवश्यकता नहीं पड़ी, उसने मालाबार में ही निमंत्रण को अनिवार्य क्यों बनाया?

यदि गांधी बिना निमंत्रण मालाबार जाते, जैसा वे चंपारण गए थे और अन्य संघर्षों में गए थे, तो उन्हें खिलाफत नेतृत्व का सामना करना पड़ता। उन्हें अली बंधुओं से नरसंहार की स्पष्ट निंदा करवानी पड़ती। उन्हें मोपला विद्रोह से स्वतंत्रता आंदोलन की नैतिक मान्यता वापस लेनी पड़ती। ऐसा करने की राजनीतिक कीमत भी थी। इससे उनका खिलाफत गठबंधन प्रभावित होता। वही गठबंधन उनके आंदोलनों को मुस्लिम संख्यात्मक समर्थन देता था।

गांधी के सार्वजनिक जीवन में निमंत्रण की यह शर्त केवल एक बार दिखाई देती है। यह वही स्थिति थी, जहाँ बिना निमंत्रण कार्य करने से उनके मुख्य राजनीतिक गठबंधन को क्षति पहुँच सकती थी।

अभियोजन का पक्ष

गांधी का निरामंत्रित उदाहरण यह दावा नहीं करता कि गांधी नरसंहार चाहते थे। यह केवल उनके सार्वजनिक जीवन और मालाबार संबंधी कथन को साथ रखता है और पाठक से दोनों के बीच के अंतर को देखने का आग्रह करता है।

  • क्या गांधी ने चार दशकों तक यह नहीं दिखाया कि किसी संघर्ष क्षेत्र में जाने के लिए ब्रिटिश निमंत्रण आवश्यक नहीं था?
  • क्या उन्होंने मालाबार के मामले में यह नहीं कहा कि ब्रिटिश शासन द्वारा निमंत्रण न देना नरसंहार का कारण बना?
  • क्या चंपारण में अपनाई गई पद्धति 1921 के मालाबार में उपलब्ध नहीं थी?
  • क्या उनके सार्वजनिक जीवन में केवल वही स्थिति निमंत्रण-आधारित बनी, जहाँ बिना निमंत्रण कार्य करने से उनका मुख्य राजनीतिक गठबंधन प्रभावित होता?

यह श्रृंखला अंतिम निष्कर्ष नहीं देती। दर्ज सार्वजनिक जीवन ही प्रमाण है। मालाबार संबंधी कथन भी प्रमाण है। पाठक दोनों को साथ देखकर उनके बीच के अंतर का अर्थ स्वयं निर्धारित करेगा।


Moplah Statements

गांधी के मोपला कथन: छह कथन, एक दिशा
पूरा घटनाक्रम एक साथ— सभी छह कथनों का दस्तावेजी प्रस्तुतीकरण, जिसमें यह लेख पाँचवें कथन की विस्तृत समीक्षा करता है।

घटनाक्रम पढ़ें →

गांधी बिना निमंत्रण चंपारण गए। उन्होंने बिना निमंत्रण असहयोग आंदोलन आरंभ किया। वे बिना निमंत्रण दांडी पहुँचे। चार दशकों के सार्वजनिक जीवन में उन्हें किसी कार्य के लिए ब्रिटिश निमंत्रण की आवश्यकता नहीं पड़ी। केवल मालाबार में निमंत्रण आवश्यक बना, जहाँ उनके अपने गठबंधन के परिणामस्वरूप हिंदुओं की हत्या हो रही थी। वे गए नहीं। उन्होंने ब्रिटिश शासन को दोषी ठहराया कि उसने उन्हें आमंत्रित नहीं किया। अभियोजन दर्ज सार्वजनिक जीवन और दर्ज कथन दोनों को पाठक के सामने रखता है। पाठक स्वयं निर्धारित करेगा कि दोनों के बीच का अंतर क्या दर्शाता है।

मुख्य चित्र: चित्र देखने के लिए यहां क्लिक करें।

वीडियो

शब्दावली

  1. निरामंत्रित उदाहरण: इस ब्लॉग-श्रृंखला में प्रयुक्त विशेष पद। इसका अर्थ है ऐसा ऐतिहासिक उदाहरण, जहाँ गांधी ने बिना किसी औपचारिक ब्रिटिश निमंत्रण के राजनीतिक या सामाजिक हस्तक्षेप किया।
  2. मोपला नरसंहार: 1921 के मालाबार विद्रोह के दौरान हुई व्यापक हिंसा, जिसमें अनेक हिंदुओं की हत्या, धर्मांतरण और विस्थापन की घटनाएँ दर्ज हुईं।
  3. खिलाफत आंदोलन: प्रथम विश्वयुद्ध के बाद उस्मानी खिलाफत को बचाने के उद्देश्य से भारत में चला आंदोलन, जिसमें गांधी ने कांग्रेस को मुस्लिम नेतृत्व के साथ जोड़ा।
  4. अली बंधु: मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली। ये खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेता थे और गांधी के राजनीतिक सहयोगी बने।
  5. कालीकट भाषण: गांधी द्वारा मालाबार घटनाओं के संदर्भ में दिया गया भाषण, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश शासन की भूमिका और हस्तक्षेप पर टिप्पणी की थी।
  6. चंपारण उदाहरण: 1917 में बिहार के चंपारण में गांधी का हस्तक्षेप, जहाँ उन्होंने बिना ब्रिटिश निमंत्रण किसानों की शिकायतों की जाँच की और समझौता कराया।
  7. रॉलेट सत्याग्रह: 1919 में रॉलेट एक्ट के विरुद्ध गांधी द्वारा चलाया गया आंदोलन, जिसे बिना ब्रिटिश अनुमति आरंभ किया गया था।
  8. असहयोग आंदोलन: 1920 में गांधी द्वारा आरंभ राष्ट्रीय आंदोलन, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के प्रशासनिक और सामाजिक ढाँचे का बहिष्कार करना था।
  9. नमक यात्रा: 1930 में दांडी तक गांधी की यात्रा, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश नमक कानून का प्रतिरोध करना था।
  10. सविनय अवज्ञा आंदोलन: ब्रिटिश शासन के नियमों के शांतिपूर्ण उल्लंघन पर आधारित आंदोलन, जिसे गांधी ने राष्ट्रीय प्रतिरोध की रणनीति के रूप में प्रयोग किया।
  11. भारत छोड़ो आंदोलन: 1942 में आरंभ आंदोलन, जिसमें ब्रिटिश शासन से तत्काल भारत छोड़ने की माँग की गई थी।
  12. राजनीतिक गठबंधन: इस ब्लॉग में गांधी और खिलाफत नेतृत्व के बीच बने सहयोग को दर्शाने वाला पद, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा को प्रभावित किया।
  13. नैतिक मान्यता: किसी आंदोलन या विद्रोह को सार्वजनिक समर्थन या वैचारिक वैधता प्रदान करने की स्थिति।
  14. अभियोजन का पक्ष: इस श्रृंखला में प्रयुक्त विश्लेषणात्मक प्रस्तुति शैली, जहाँ लेखक दस्तावेजी तथ्यों को प्रश्नों के रूप में पाठक के सामने रखता है।
  15. दर्ज सार्वजनिक जीवन: गांधी के राजनीतिक जीवन से जुड़े दस्तावेजी अभिलेख, भाषण, आंदोलन और सार्वजनिक कार्यवाहियाँ, जिनका उपयोग इस श्रृंखला में प्रमाण के रूप में किया गया है।

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Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)

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