गांधी की उत्तरदायी आकांक्षाएँ: नेहरू प्रतिवेदन ने क्या संतुष्ट किया—और क्या नहीं (85)
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भाग 85: महात्मा गांधी के शांति प्रयास | श्रृंखला अनुक्रमणिका
ब्लॉग 84 में कलकत्ता मतदान का विवरण प्रस्तुत किया गया था—चार संशोधन और चार अस्वीकृतियाँ। यह लेख नेहरू प्रतिवेदन पर गांधी के प्रलेखित कथन को उन अस्वीकृत संशोधनों के साथ रखता है और एक स्पष्ट प्रश्न पूछता है: प्रतिवेदन ने किन आकांक्षाओं को संतुष्ट किया और गांधी की परिभाषा के अनुसार कौन-सी आकांक्षाएँ उत्तरदायी नहीं मानी गईं?
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!मूल स्रोत
दिसंबर 1928 में नेहरू प्रतिवेदन पर गांधी का प्रलेखित कथन था:
“मैंने यह सुझाव देने का साहस किया कि यह प्रतिवेदन सभी उत्तरदायी आकांक्षाओं को संतुष्ट करता है और अपने गुणों के आधार पर पूरी तरह टिक सकता है।”
यह कथन कलकत्ता अधिवेशन में दिया गया था। उसी अधिवेशन में जिन्ना के तीन संशोधनों पर औपचारिक मतदान हुआ और तीनों अस्वीकृत कर दिए गए।
यह लेख गांधी के इस कथन की तुलना नेहरू प्रतिवेदन की वास्तविक सामग्री और उसके बहिष्करणों से करता है।
प्रतिवेदन ने क्या संतुष्ट किया
नेहरू प्रतिवेदन ने डोमिनियन दर्जे, संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों, अवशिष्ट शक्तियों को केंद्र में रखने तथा बंगाल और पंजाब में जनसंख्या के आधार पर मुस्लिम सीट आरक्षण न देने की अनुशंसा की। इसने दिसंबर 1927 के मद्रास अधिवेशन में कांग्रेस और जिन्ना के बीच बने समझौतों को पलट दिया।
गांधी ने इस व्यवस्था को सभी उत्तरदायी आकांक्षाओं को संतुष्ट करने वाला बताया। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि इस व्यवस्था में क्या सम्मिलित था और जिन्ना ऐसी कौन-सी बातें चाहते थे जो इसमें सम्मिलित नहीं थीं।
प्रतिवेदन ने क्या संतुष्ट नहीं किया
कलकत्ता में जिन्ना ने अपनी मांगों को तीन न्यूनतम प्रावधानों तक सीमित कर दिया था—केंद्र में मुसलमानों को एक-तिहाई प्रतिनिधित्व, बंगाल और पंजाब में जनसंख्या के अनुपात में सीटें तथा अवशिष्ट शक्तियों का प्रांतों को हस्तांतरण। यह उनकी पहले की व्यापक मांगों की तुलना में एक महत्वपूर्ण कमी थी।
तीनों प्रस्ताव मतदान द्वारा अस्वीकृत कर दिए गए।
गांधी का कथन इन अस्वीकृतियों के बाद आया। इसलिए यह प्रश्न उठता है कि क्या जिन्ना के ये तीन न्यूनतम प्रावधान गांधी की परिभाषा में उत्तरदायी आकांक्षाओं की श्रेणी से बाहर रखे गए थे।
उस समय जिन्ना कांग्रेस के लिए उपलब्ध सबसे अधिक संवैधानिक समझौते के लिए तैयार मुस्लिम नेता थे। उन्होंने साइमन आयोग का कांग्रेस के साथ विरोध किया था। उन्होंने पृथक निर्वाचन क्षेत्रों जैसी विवादास्पद मांग पर भी समझौते की इच्छा दिखाई थी। इसके बावजूद उनके तीनों न्यूनतम प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिए गए।
उस समय जिन्ना की स्थिति
1928 में जिन्ना की स्थिति प्रलेखित अभिलेखों से स्पष्ट होती है। उन्होंने साइमन आयोग का विरोध किया जबकि सर मुहम्मद शफी का समूह ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग कर रहा था।
जिन्ना पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के स्थान पर अन्य संवैधानिक रियायतें स्वीकार करने को तैयार थे। यह रुख कांग्रेस के लिए अधिक अनुकूल था। कलकत्ता में उन्होंने अपनी मांगों को केवल तीन न्यूनतम प्रावधानों तक सीमित कर दिया ताकि सहमति का आधार बन सके।
कलकत्ता अधिवेशन में एक हिंदू महासभा नेता ने प्रश्न उठाया कि क्या जिन्ना वास्तव में मुस्लिम मत का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिन्ना ने उत्तर दिया:
“क्या आप चाहते हैं कि मुस्लिम भारत आपके साथ चले? यदि आप आज इस प्रश्न का समाधान नहीं करेंगे, तो हमें इसे कल करना पड़ेगा।”
इसके बाद गांधी ने उस व्यवस्था को सभी उत्तरदायी आकांक्षाओं को संतुष्ट करने वाली बताया जिसने जिन्ना के तीनों प्रस्ताव अस्वीकार कर दिए थे।
प्रलेखित परिणाम
इन घटनाओं के बाद जिन्ना ने कलकत्ता को “मार्गों का विभाजन” कहा। 1930 में वे इंग्लैंड चले गए और प्रिवी काउंसिल में वकालत करने लगे। वे 1935 में भारतीय राजनीति में लौटे और मुस्लिम लीग का नेतृत्व संभाला।
यह वही जिन्ना थे जिनका संवैधानिक मार्ग 1920 के नागपुर अधिवेशन में सीमित हो गया था। यही नेता साइमन आयोग के विरोध में गांधी के साथ खड़े हुए थे। यही नेता समझौते की खोज में अपनी मांगें घटाकर तीन प्रावधानों तक लाए थे।
1935 में लौटने के बाद उन्होंने मुस्लिम लीग का नेतृत्व किया और 1940 में पाकिस्तान की मांग सामने आई। गांधी के दिसंबर 1928 के कथन और 1940 की पाकिस्तान मांग के बीच बारह वर्ष का अंतर था। नागपुर से पाकिस्तान मांग तक का अंतर लगभग बीस वर्ष का था। दोनों क्रम उस बिंदु से होकर गुजरते हैं जहाँ गांधी ने उस व्यवस्था को पर्याप्त बताया जिसने जिन्ना को कोई संवैधानिक रियायत नहीं दी थी।

अभियोजन पक्ष का दृष्टिकोण
यह लेख पाठक के सामने तीन प्रश्न रखता है:
- क्या गांधी के इस कथन ने जिन्ना के तीन न्यूनतम प्रस्तावों को उत्तरदायी आकांक्षाओं की श्रेणी से बाहर रखा?
- क्या उस समय जिन्ना कांग्रेस के लिए उपलब्ध सबसे अधिक समझौता करने वाले मुस्लिम नेता थे, जिन्होंने साइमन आयोग का विरोध किया, पृथक निर्वाचन क्षेत्रों पर समझौते की इच्छा दिखाई और अपनी मांगें घटाकर तीन प्रावधानों तक सीमित कर दीं?
- क्या इन तीन प्रस्तावों की अस्वीकृति को सभी उत्तरदायी आकांक्षाओं की संतुष्टि बताकर गांधी ने उस अंतिम संवैधानिक मार्ग को बंद कर दिया जो जिन्ना को संयुक्त भारत की व्यवस्था के भीतर रख सकता था?
यह लेख इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देता। गांधी का कथन मूल स्रोत है। तीन अस्वीकृत प्रावधान प्रलेखित तथ्य हैं। इसके बाद की घटनाएँ—जिन्ना का प्रस्थान, 1935 में वापसी और 1940 की पाकिस्तान मांग—भी अभिलेखों में दर्ज हैं।
अभियोजन पक्ष इन तथ्यों को बिना अतिरिक्त टिप्पणी के पाठक के सामने रखता है। निष्कर्ष निकालना पाठक का कार्य है।
दिसंबर 1928, कलकत्ता। तीन न्यूनतम प्रस्ताव मतदान द्वारा अस्वीकृत हुए। गांधी ने कहा कि प्रतिवेदन सभी उत्तरदायी आकांक्षाओं को संतुष्ट करता है। जिन्ना ने इसे रास्तों का अलगाव कहा। 1930 में वे इंग्लैंड गए। 1935 में लौटकर लीग का नेतृत्व संभाला। 1940 में पाकिस्तान की मांग सामने आई। अभियोजन पक्ष इस पूरे क्रम के केंद्र में गांधी के प्रलेखित कथन को रखता है। आगे का निष्कर्ष पाठक निकालेगा।
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शब्दावली
- नेहरू प्रतिवेदन (Nehru Report): 1928 में प्रस्तुत संवैधानिक मसौदा जिसने भारत के लिए डोमिनियन दर्जे और संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों की अनुशंसा की थी।
- डोमिनियन दर्जा (Dominion Status): ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासित स्थिति, जिसमें आंतरिक प्रशासन पर व्यापक अधिकार होते थे, परंतु पूर्ण स्वतंत्रता नहीं होती थी।
- संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र (Joint Electorates): ऐसी निर्वाचन व्यवस्था जिसमें सभी समुदायों के मतदाता एक ही निर्वाचन क्षेत्र में मतदान करते हैं।
- पृथक निर्वाचन क्षेत्र (Separate Electorates): ऐसी व्यवस्था जिसमें प्रत्येक समुदाय अपने प्रतिनिधियों का चुनाव केवल अपने मतदाताओं के माध्यम से करता है।
- अवशिष्ट शक्तियाँ (Residual Powers): वे शासकीय अधिकार जो संविधान में स्पष्ट रूप से किसी स्तर की सरकार को नहीं दिए गए हों।
- कलकत्ता अधिवेशन (Calcutta Session, 1928): कांग्रेस का वह अधिवेशन जिसमें नेहरू प्रतिवेदन पर चर्चा हुई और जिन्ना के तीन संशोधन अस्वीकृत हुए।
- मुहम्मद अली जिन्ना: उस समय के प्रमुख मुस्लिम संवैधानिक नेता जिन्होंने कलकत्ता में अपनी मांगों को तीन न्यूनतम प्रावधानों तक सीमित किया।
- तीन न्यूनतम प्रावधान (Three Minimum Provisions): जिन्ना की संशोधित मांगें—केंद्र में एक-तिहाई मुस्लिम प्रतिनिधित्व, बंगाल एवं पंजाब में जनसंख्या अनुपात के अनुसार सीटें तथा अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों को देना।
- साइमन आयोग (Simon Commission): 1927 में गठित ब्रिटिश आयोग जिसने भारतीय संवैधानिक सुधारों की समीक्षा की। कांग्रेस और जिन्ना ने इसका विरोध किया था।
- सर मुहम्मद शफी गुट: मुस्लिम राजनीति का वह समूह जिसने साइमन आयोग के साथ सहयोग का मार्ग अपनाया था।
- उत्तरदायी आकांक्षाएँ (Responsible Aspirations): गांधी द्वारा नेहरू प्रतिवेदन के संदर्भ में प्रयुक्त अभिव्यक्ति, जिसका अर्थ और दायरा इस लेख का केंद्रीय विषय है।
- मार्गों का विभाजन (Parting of the Ways): जिन्ना द्वारा कलकत्ता अधिवेशन के परिणामों का वर्णन करने हेतु प्रयुक्त ऐतिहासिक अभिव्यक्ति।
- प्रिवी काउंसिल (Privy Council): ब्रिटिश साम्राज्य की सर्वोच्च अपीलीय संस्था, जहाँ जिन्ना ने इंग्लैंड में वकालत की।
- मुस्लिम लीग (Muslim League): राजनीतिक संगठन जिसका नेतृत्व जिन्ना ने 1935 में भारत लौटने के बाद पुनः संभाला।
- गांधी की उत्तरदायी आकांक्षाएँ (Gandhi’s Responsible Aspirations): इस श्रृंखला में प्रयुक्त विशिष्ट अवधारणा, जो गांधी के 1928 के कथन और उसके राजनीतिक प्रभावों की समीक्षा करती है।
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Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)
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