गांधी की मांगों का विश्लेषण: ब्रिटेन ‘हाँ’ क्यों नहीं कह सकता था (12)
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भाग 12: महात्मा गांधी के शांति प्रयास | श्रृंखला अनुक्रमणिका
ग्यारह पोस्टों ने इनर टेम्पल से दांडी तक पद्धति का, चार कार्यों के बही-खाते का, और गांधी द्वारा इरविन के सामने रखे गए घोषणापत्र का अनुसरण किया। पिछली पोस्ट ने माँगों की सूची दी। इस पोस्ट में हम देखेंगे कि गांधीजी की मांगों में कैसे ब्रिटिश राज का विध्वंश छुपा था। पोस्ट यह भी जानने का प्रयास करेगी कि वाइसराय की चुप्पी उदासीनता नहीं बल्कि एक सुनियोजित निर्णय था।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!की गई कार्रवाई: 11 मांगों के घोषणापत्र ने औपनिवेशिक वित्तीय ढाँचे को सीधे चुनौती दी। इसमें सैन्य खर्च और भूमि राजस्व में 50 प्रतिशत कटौती तथा नमक कर समाप्त करने की मांग थी।
किसने मूल्य चुकाया: गंभीर महामंदी के दौरान कीमतें गिरने के बावजूद कृषि उत्पादकों को भूमि राजस्व और नमक कर देना जारी रखना पड़ा।
बाईपास किया गया विकल्प: औपचारिक औपनिवेशिक विधायी बजट सभाएँ। इन कटौतियों को स्वीकार करने पर साम्राज्यवादी प्रशासन का ढाँचा प्रभावित होता।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: इससे स्पष्ट होता है कि ब्रिटेन इन मांगों को क्यों स्वीकार नहीं कर सकता था। इन्हें मानने से औपनिवेशिक निष्कर्षण तंत्र टूटता। यही बाद के समझौते को मापने का आधार बनता है।
सूची नहीं — ढांचा तोड़ने की योजना
गांधी की मांगों का विश्लेषण कुछ ऐसा दिखलाता है जो मानक ऐतिहासिक विवरण छुपाता है। अलग-अलग पढ़ें तो ग्यारह माँगें शिकायतें हैं। एक साथ पढ़ें तो वे औपनिवेशिक निकासी तंत्र को ध्वस्त करने का एक पूर्ण खाका हैं।
ब्रिटिश राज केवल बल पर आधारित नहीं था। यह कई परस्पर जुड़े तंत्रों का एक जटिल जाल था, जो इसके बने रहने को सुनिश्चित करता था। उस व्यवस्था के चार भाग थे: वित्तीय निष्कर्षण, सूचना नियंत्रण, कानूनी निःशस्त्रीकरण, और वाणिज्यिक एकाधिकार। गांधी की हर एक माँग ने उस व्यवस्था की एक विशिष्ट आधार स्तंभ को निशाना बनाया। गांधी की मांगों का विश्लेषण दर्शाता है कि यदि ब्रिटिश राज इन्हें मान लेता तो राज बच ही नहीं पाता। जो बचता वह केवल एक ब्रिटिश प्रशासनिक उपस्थिति होती — एक ऐसे देश में जिसने अपनी अर्थव्यवस्था वापस पा ली हो, अपने नागरिकों को शस्त्र दे दिए हों, अपने राजनीतिक वर्ग को मुक्त कर दिया हो, और लंदन को जाने वाली वित्तीय नलिका तोड़ दी हो।
इसी कारण इरविन ने बातचीत से दूरी बनाई। वे ऐसा करने की स्थिति में नहीं थे।
माँगें दिसंबर 1929 की लाहौर कांग्रेस के छह सप्ताह बाद आईं जिसमें पूर्ण स्वराज घोषित हुआ था। गांधी बातचीत की शुरुआत नहीं कर रहे थे, बल्कि एक निर्णायक चरण से पहले अंतिम संकेत दे रहे थे। वे एक ऐसे आंदोलन से पहले अंतिम चेतावनी दे रहे थे जो पहले से स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्ध था।
गांधी की मांगों का विश्लेषण: वित्तीय निष्कर्षण की माँगें
रुपया-स्टर्लिंग विनिमय दर
1s 6d (1 शिलिंग 6 पेंस प्रणाली अर्थात 1पौंड बराबर 1.33 रूपए) की विनिमय दर — जिसे गांधी 1s 4d करने की माँग कर रहे थे — कोई साधारण गणना नहीं थी। यह प्रतिदिन भारत से ब्रिटेन की ओर संपत्ति के प्रवाह का मुख्य साधन थी। हर सरकारी लेनदेन, हर रेलवे प्रेषण, इंग्लैंड में सेवानिवृत्त हर ब्रिटिश अधिकारी को पेंशन भुगतान, हर आयात चालान — सभी एक ऐसी दर पर गणना किए जाते थे जो रुपये के मुकाबले स्टर्लिंग को व्यवस्थित रूप से अधिमूल्यित करती थी। दादाभाई नौरोजी ने दशकों पहले धन की निकासी की मात्रा निर्धारित की थी। यह अनुपात उस निकासी का हिस्सा था। यह माँग मानने से ब्रिटिश खातों में भारतीय संपत्ति का दैनिक स्थानांतरण प्रति वर्ष करोड़ों रुपये कम हो जाता। भारत में ब्रिटिश खजाने की स्थिति इस दर पर आंशिक रूप से बनी थी। यह दर नहीं छोड़ी जा सकती थी।
भूमि राजस्व — 50% की कमी
भूमि राजस्व भारत से औपनिवेशिक आय का सबसे पुराना और सबसे बड़ा एकल स्रोत था। ब्रिटिश ने इसे अधिकतम निकालने योग्य स्तरों पर निर्धारित किया था। यह नकद में देय था — अच्छी फसल हो या खराब। औपनिवेशिक प्रशासकों ने दरें तय कीं — उन लोगों के प्रति किसी जवाबदेही के बिना जो यह चुका रहे थे। विधायी नियंत्रण के साथ 50% की कमी से भारतीय बजट की सबसे बड़ी एकल राजस्व रेखा कट जाती। इस राजस्व पर निर्भर कोई भी औपनिवेशिक प्रशासन यह स्वीकार नहीं कर सकता था। उस समय भारतीय सैन्य बजट भारत के कुल वार्षिक राजस्व का लगभग आधा खपाता था — मिस्र, मेसोपोटामिया और चीन में ब्रिटिश साम्राज्यिक अभियानों के लिए, भारतीय रक्षा के लिए नहीं। 50% की कमी कोई सुधार नहीं थी। 50% कटौती की मांग मान लेना साम्राज्यिक आधार के अंत का शंखनाद था।
नमक कर और एकाधिकार की समाप्ति
नमक कर भारत का सबसे सार्वभौमिक कर था — आय, जाति, धर्म या क्षेत्र की परवाह किए बिना हर व्यक्ति पर। गांधी ने इसे मार्च के लिए ठीक इसलिए चुना क्योंकि यह सूची की सबसे असमर्थनीय वस्तु थी — एक महाशक्ति एक किसान के खाना स्वादिष्ट बनाने के अधिकार पर कर लगा रही थी। नमक एकाधिकार केवल राजस्व के बारे में नहीं था। नमक का अधिनियम एक बुनियादी वस्तु के नियंत्रण के बारे में था जिसे अंग्रेजों ने भारतीयों के लिए स्वतंत्र रूप से उत्पादन या व्यापार करना अवैध बना दिया था। एकाधिकार समाप्त करो और एक सिद्धांत स्थापित होता है: भारतीयों को अपनी धरती पर उगने वाली चीज़ का उत्पादन करने का अधिकार है। वह सिद्धांत, एक बार नमक में स्वीकार हो जाए, रोका नहीं जा सकता था।
सैन्य और नागरिक वेतन में 50% की कटौती
ये दोनों माँगें मिलकर कब्जे की लागत को ही निशाना बनाती थीं। भारत अपनी अधीनस्थता के लिए खुद भुगतान कर रहा था। भारत एक ऐसी सेना का वित्त पोषण कर रहा था जो ब्रिटिश साम्राज्यिक ज़रूरतों के लिए बनाई गई थी जो ब्रिटिश साम्राज्यिक ज़रूरतों के लिए बनी थी। इस व्यवस्था के अंतर्गत एक ऐसी नागरिक सेवा का पोषण हो रहा था जिसका भारतीय समाज से कोई संबंध नहीं था, बल्कि जिसका उपयोग भारतीयों पर नियंत्रण के लिए किया जा रहा था। वायसराय प्रतिदिन 700 रुपये कमाते थे। भारत की औसत आय दो आने से कम थी। यह आय वितरण की भिन्नता कोई अपवाद नहीं था। इसे समझदारी से गढ़ा गया था। दोनों में 50% की कटौती से कब्जा आर्थिक रूप से अस्थिर हो जाता। भारतीय ढांचा एक ऐसे ढाँचे में सिमट जाता जो उपमहाद्वीप के प्रशासन के लिए आवश्यक प्रतिभा को अब नहीं खींच पाता।

गांधी की मांगों का विश्लेषण: नियंत्रण संरचना की माँगें
CID की समाप्ति
आपराधिक जाँच विभाग औपनिवेशिक राजनीतिक नियंत्रण की तंत्रिका प्रणाली था — कोई पुलिस बल नहीं बल्कि एक गुप्त तंत्र। इस तंत्र के द्वारा राष्ट्रवादियों पर दृष्टि रखी जाती थी, संगठनों में घुसपैठ की जाती थी, असहमत लोगों का रिकॉर्ड रखा जाता था, और औपनिवेशिक प्रशासन के सूचना तंत्र का बहुत बड़ा भाग था जो विरोध के खतरनाक होने से पहले उसे दबाने के लिए चाहिए थी। रॉलेट एक्ट इसकी विधायी अभिव्यक्ति था। CID को समाप्त करना या उसे जन नियंत्रण में रखना औपनिवेशिक प्रशासन को भारत के आंतरिक राजनीतिक परिदृश्य से अंधा कर देता। इस तंत्र में बदलाव भविष्य के किसी भी संगठित प्रतिरोध को पहचानने, उसका अनुसरण करने और उसे रोकने की क्षमता हटा देता। कोई भी कब्जेदार शक्ति स्वेच्छा से अपना गुप्त नेटवर्क नहीं तोड़ती।
शस्त्र अधिनियम — आत्मरक्षा के लिए लाइसेंस
1878 का शस्त्र अधिनियम ब्रिटिश द्वारा भारत में पारित सबसे महत्वपूर्ण कानूनों में से एक था। इसने करोड़ों की जनसंख्या को निहत्था किया। कोई भारतीय बिना औपनिवेशिक राज्य के लाइसेंस के आग्नेयास्त्र नहीं रख सकता था — और राज्य के पास राजनीतिक प्रतिष्ठा वाले किसी भी व्यक्ति को उपनिवेशवादी तंत्र में बदलाव की मांग करने का अधिकार देना उनकी सम्प्रभुता में हस्तक्षेप करना माना जाता । गांधी ने इरविन को पत्र में इसके परिणाम को एक आध्यात्मिक अवमानना कहा — एक जनता जिसे जानबूझकर कापुरुष बनाया गया। आत्मरक्षा के लिए शस्त्र रखने का अधिकार देना पचास वर्षों की थोपी गई निःशस्त्रता की नीति को पलट देता। निहत्थी जनसंख्या नियंत्रणीय है। शस्त्रधारी नहीं।
राजनीतिक बंदियों को जेल से छोड़ना
हजारों भारतीय हिंसा के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक गतिविधि के लिए औपनिवेशिक जेलों में थे — लिखने, बोलने, संगठित होने, असहमत होने के लिए। उनका निरंतर कारावास दंड से परे एक दमनकारी उद्देश्य की पूर्ति करता था। इस दमनकारी की सहायता से हर भारतीय को दिखलाता जाता था कि राजनीतिक गतिविधि की एक व्यक्तिगत कीमत है। उन्हें बिना शर्त छोड़ना एक ऐसी स्वीकृति होती कि राजनीतिक असहमति वैध है। वह स्वीकृति औपनिवेशिक राज्य और जिन लोगों पर वह शासन करता था, उनके बीच के संबंध को मौलिक रूप से बदल देती।
गांधी की मांगों का विश्लेषण: वाणिज्यिक संप्रभुता की माँगें
विदेशी कपड़े पर सुरक्षात्मक शुल्क
उन्नीसवीं शताब्दी से बिना शुल्क सुरक्षा के आयातित ब्रिटिश मिल के माल से भारतीय वस्त्र श्रमिकों को व्यवस्थित रूप से नष्ट किया गया था। एक सुरक्षात्मक शुल्क से भारतीय उद्योग पुनर्जीवित होता। इससे भी महत्वपूर्ण है कि यह एक सिद्धांत स्थापित करता कि भारत को ब्रिटिश वाणिज्यिक शोषण से अपनी अर्थव्यवस्था की रक्षा करने का अधिकार है। लंकाशायर की मिल हितों की ब्रिटिश संसद तक सीधी पहुँच थी। विदेशी कपड़े पर शुल्क लंकाशायर पर शुल्क था। संसद यह अनुमति नहीं दे सकती थी।
तटीय नौवहन आरक्षण
भारतीय बंदरगाहों के बीच भारतीय माल ब्रिटिश जहाजों पर ब्रिटिश दरों पर चलता था। खुली प्रतियोगिता समाप्त हो चुकी थी और वाणिज्यिक एकाधिकार स्थापित हो चुका था जिससे अधिकांश भारतीयों व्यवसायियों को काम नहीं मिलता था। तटीय व्यापार भारतीय जहाजों के लिए आरक्षित करने से भारतीय उद्यम को एक महत्वपूर्ण राजस्व प्रवाह मिलता। यह मांग एक स्वतंत्र भारत के लिए अपनी शर्तों पर व्यापार करने का शिपिंग बुनियादी ढाँचा बनाने का प्रयास था। यह मांग वाणिज्यिक और संप्रभुता ग्यारहों मिलकर घातक सिद्ध होती थीं।
पूर्ण प्रतिबंध
शराब और नशीले पदार्थ उत्पाद शुल्क भूमि के बाद औपनिवेशिक राज्य का दूसरा सबसे बड़ा राजस्व स्रोत था। इससे पूरी तरह गरीबों का धन लूटा जाता था। 1919 के द्वैध शासन सुधारों ने इस राजस्व का कार्यभार भारतीय मंत्रियों को हस्तांतरित किया था — जिससे प्रतिबंध राजनीतिक रूप से असंभव हो गया। जो मंत्री इसे समाप्त करे, उसे राजस्व कहीं और से खोजना होता। यह शुल्क एक राजकोषीय जाल था। पूर्ण प्रतिबंध से औपनिवेशिक आय का एक प्रमुख स्रोत हट जाता। इसका समाप्त करना व्यसन की एक जानबूझकर बनाए रखी गई व्यवस्था को समाप्त कर देता — जिसे गांधी राजस्व के स्रोत जितना ही नियंत्रण का उपकरण मानते थे।

मार्च के लिए नमक क्यों चुना गया
ग्यारह माँगों में से गांधी ने नमक कर को नाटकीय बनाने के लिए चुना। वह चुनाव सटीक था।
हर अन्य माँग में एक ऐसा वर्ग था जो उसके विरुद्ध तर्क कर सकता था। विनिमय दर जटिल थी। सैन्य कटौती बहसयोग्य थी। CID की समाप्ति सुरक्षा का प्रश्न था। शस्त्र लाइसेंस विवादास्पद थे। नमक कर का कोई समर्थनयोग्य वर्ग नहीं था। नमक कर बिना किसी अपवाद के हर भारतीय पर पड़ता था — सबसे गरीब पर सबसे भारी, सबसे अमीर पर हल्का, लेकिन कोई नहीं बचता था। यह एक ऐसे खनिज पर कर लगाता था जो भारत के अपने तट पर प्राकृतिक रूप से पाया जाता था। भारतीयों को कानून द्वारा इसे खुद इकट्ठा करने से मना किया गया था।
नमक की माँग इसलिए नहीं चुनी गई क्योंकि नमक कर आर्थिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण थी — भूमि राजस्व कहीं बड़ा था — बल्कि इसलिए क्योंकि इस कर से सामान्य नागरिक प्रभावित होता था और कर हर नैतिक मानक पर असमर्थनीय था। इस कर को हटाने की मांग बिहार के काश्तकार किसान, गुजराती व्यापारी, बंगाल के छात्र, और मद्रास के वकील को एकसाथ एकजुट कर सकती थी। नमक बनाने के लिए केवल समुद्र के तट तक ही जाना था, और कुछ नहीं।
माँग और मार्च एक ही तर्क थे: सबसे बुनियादी मानवीय आवश्यकता पर एक विदेशी शक्ति ने कर लगाया था, और अपने तट पर बह आई चीज़ उठाना प्रतिरोध का एक कार्य था।
गांधी की मांगों का विश्लेषण: एक तंत्र रूप
विनिमय दर हेरफेर हटाओ — वित्तीय निकासी धीमी होती है। नमक और भूमि राजस्व हटाओ — ग्रामीण निष्कर्षण समाप्त होता है। CID समाप्त करो — निगरानी ढह जाती है। शस्त्र अधिनियम बहाल करो — थोपी गई निःशस्त्रता समाप्त होती है। राजनीतिक बंदियों को मुक्त करो — असहमति वैध हो जाती है। विदेशी कपड़े पर कर लगाओ — भारतीय उद्योग पुनर्जीवित होता है। तटीय नौवहन आरक्षित करो — वाणिज्यिक संप्रभुता शुरू होती है। सैन्य और नागरिक वेतन घटाओ — कब्जा अवहनीय हो जाता है।
कोई एकल माँग अकेले राज के लिए घातक नहीं थी। ग्यारहों मिलकर थीं। तीन वर्ग — वित्तीय निष्कर्षण, नियंत्रण संरचना, वाणिज्यिक संप्रभुता — कोई सुधार एजेंडा नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक विध्वंस प्रकट करते हैं। यही गांधी ने मेज पर रखा था। इरविन ने इसे पढ़ा। वे समझे। उन्होंने इसे अनदेखा किया। मार्च शुरू हुआ।
अगली पोस्ट 5 मार्च 1931 को हस्ताक्षरित दस्तावेज़ खोलती है — और इसे माँग-दर-माँग, यहाँ सूचीबद्ध हर पंक्ति के विरुद्ध मापती है।
एक नज़र में ढांचा तोड़ने की योजना
| माँग | मांगें क्या ध्वस्त करती हैं | ब्रिटेन क्यों नहीं मान सकता था |
|---|---|---|
| रुपया-स्टर्लिंग विनिमय दर | धन की निकासी का दैनिक तंत्र | ब्रिटिश खजाने की भारत में स्थिति इस दर पर बनी थी |
| भूमि राजस्व में 50% कमी | औपनिवेशिक बजट की सबसे बड़ी एकल राजस्व रेखा | इस राजस्व के बिना प्रशासन चल नहीं सकता था |
| नमक कर और एकाधिकार की समाप्ति | बुनियादी वस्तुओं पर नियंत्रण और सार्वभौमिक निष्कर्षण | नमक में स्वीकार सिद्धांत सभी संसाधनों पर लागू होता |
| सैन्य व्यय में 50% कटौती | साम्राज्यिक सैन्य आधार के रूप में भारत | भारत ब्रिटिश साम्राज्यिक अभियानों की रीढ़ था |
| नागरिक वेतन में 50% कटौती | कब्जे को अवहनीय बनाने वाली वित्तीय व्यवस्था | इस वेतन पर ही उपमहाद्वीप के लिए प्रतिभा आकर्षित होती थी |
| CID की समाप्ति | राजनीतिक दमन की गुप्त संरचना | कोई भी कब्जेदार शक्ति अपना गुप्त नेटवर्क स्वेच्छा से नहीं तोड़ती |
| शस्त्र अधिनियम — आत्मरक्षा लाइसेंस | थोपी गई निःशस्त्रता और जनसंख्या नियंत्रणीयता | शस्त्रधारी जनसंख्या प्रबंधनीय नहीं रहती |
| राजनीतिक बंदियों की रिहाई | असहमति की कीमत का सार्वजनिक प्रदर्शन | रिहाई राजनीतिक असहमति को वैध ठहरा देती |
| विदेशी कपड़े पर सुरक्षात्मक शुल्क | लंकाशायर का भारतीय बाज़ार पर एकाधिकार | लंकाशायर का ब्रिटिश संसद तक सीधा प्रभाव था |
| तटीय नौवहन आरक्षण | ब्रिटिश शिपिंग वाणिज्यिक एकाधिकार | वाणिज्यिक संप्रभुता स्वतंत्र व्यापार का आधार बनती |
| पूर्ण प्रतिबंध | दूसरा सबसे बड़ा औपनिवेशिक राजस्व स्रोत और नियंत्रण उपकरण | द्वैध शासन ने इसे राजनीतिक रूप से असंभव बना दिया था |
गांधी की मांगों का विश्लेषण। हर एक औपनिवेशिक निष्कर्षण की एक आधार स्तंभ। मिलकर, एक ढांचा तोड़ने की योजना। समझौते ने क्या बचाया?
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शब्दावली
- रुपया–स्टर्लिंग विनिमय दर: औपनिवेशिक काल में भारतीय रुपये और ब्रिटिश पाउंड के बीच निर्धारित दर, जिसके माध्यम से भारत से धन का हस्तांतरण होता था।
- निकासी सिद्धांत (Drain Theory): दादाभाई नौरोजी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत, जो भारत से ब्रिटेन की ओर धन के व्यवस्थित प्रवाह को समझाता है।
- भूमि राजस्व प्रणाली: ब्रिटिश शासन द्वारा लागू कृषि कर व्यवस्था, जिसमें किसानों से नकद कर लिया जाता था, चाहे उत्पादन कैसा भी हो।
- नमक कर: नमक के उत्पादन और उपभोग पर लगाया गया कर, जो औपनिवेशिक शासन का एक सार्वभौमिक राजस्व स्रोत था।
- नमक एकाधिकार: ब्रिटिश नियंत्रण जिसमें भारतीयों को स्वतंत्र रूप से नमक बनाने या बेचने से रोका गया था।
- आपराधिक जाँच विभाग (CID): औपनिवेशिक शासन की खुफिया एजेंसी, जो राजनीतिक गतिविधियों की निगरानी और दमन के लिए कार्य करती थी।
- रॉलेट एक्ट: 1919 का कानून, जिसने बिना मुकदमे के गिरफ्तारी और नजरबंदी की अनुमति दी।
- शस्त्र अधिनियम 1878: ब्रिटिश कानून जिसने भारतीयों को हथियार रखने से प्रतिबंधित किया, जिससे जनसंख्या को निहत्था रखा गया।
- राजनीतिक बंदी: वे व्यक्ति जिन्हें औपनिवेशिक शासन द्वारा राजनीतिक गतिविधियों, लेखन या संगठन के कारण कैद किया गया।
- सुरक्षात्मक शुल्क (Protective Tariff): आयातित वस्तुओं पर लगाया गया कर, जिसका उद्देश्य स्थानीय उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना होता है।
- लंकाशायर वस्त्र हित: ब्रिटेन के लंकाशायर क्षेत्र के वस्त्र उद्योग, जिनका भारतीय बाजार पर बड़ा आर्थिक प्रभाव था।
- तटीय नौवहन आरक्षण: भारतीय बंदरगाहों के बीच व्यापार को भारतीय जहाजों तक सीमित करने का प्रस्ताव।
- द्वैध शासन (Dyarchy): 1919 के सुधारों के तहत लागू प्रशासनिक व्यवस्था, जिसमें शासन के कुछ विभाग भारतीयों और कुछ ब्रिटिश अधिकारियों के अधीन थे।
- औपनिवेशिक निकासी तंत्र: वह समग्र व्यवस्था जिसके माध्यम से भारत की संपत्ति ब्रिटेन को हस्तांतरित की जाती थी।
- साम्राज्यिक सैन्य आधार: भारत का उपयोग ब्रिटिश साम्राज्य के सैन्य अभियानों के लिए संसाधन और सैनिक प्रदान करने के केंद्र के रूप में।
- 1 शिलिंग 6 पेंस प्रणाली: ब्रिटेन की दशमलव-पूर्व मुद्रा प्रणाली में 1 शिलिंग 6 पेंस का अर्थ एक शिलिंग और छह पेंस होता था। यह उस समय 18 पुराने पेंस या आज के 7.5 पेंस के बराबर था। ऐतिहासिक रूप से, ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान एक भारतीय रुपये की विनिमय दर भी यही थी, यानी एक पाउंड के लिए 13.33 रुपये।
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Gandhi’s Peace Efforts: The Questions Before the Mahatma (0)
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