सुप्रीम कोर्ट में जूता फेंकने की घटना क्यों?
(Canonical Link: मुख्य ब्लॉग — Shoe at Supreme Court)
भारत के सुप्रीम कोर्ट में जूता फेंकने की घटना ने पूरे देश को विचलित कर दिया। यह कोई क्षणिक आवेग नहीं था — बल्कि उस गहरी निराशा और असंतोष की अभिव्यक्ति थी, जो वर्षों से न्यायिक निर्णयों में दिखाई देने वाले असंतुलन को लेकर बढ़ती जा रही है।
इस घटना के बाद अधिवक्ता राकेश किशोर ने अपने विस्तृत वीडियो वक्तव्य में विस्तार से बताया कि किन कारणों और अनुभवों ने उन्हें यह कदम उठाने के लिए विवश किया।
उनका आरोप था कि सुप्रीम कोर्ट हिन्दू धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों पर बार-बार संरचनात्मक पक्षपात प्रदर्शित करता है, जबकि अन्य समुदायों से संबंधित मामलों में वही संस्था अत्यधिक संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण अपनाती है।
राकेश किशोर द्वारा दिया गया विवरण
किशोर का वक्तव्य केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं था — उसमें ठोस उदाहरणों, न्यायिक टिप्पणियों और हालिया मामलों का क्रमबद्ध उल्लेख था, जिनसे उन्हें यह अनुभव हुआ कि एक समान मानदंड सभी के लिए लागू नहीं किए जा रहे हैं।
उनका तर्क था कि जब बात सनातन परंपराओं या हिन्दू धार्मिक अधिकारों की आती है, तो न्यायपालिका कठोरता या व्यंग्य का स्वर अपनाती है;
जब वही स्थिति अन्य समुदायों से जुड़ी होती है, तो मानवीय करुणा, संवेदना और संरक्षण के सिद्धांत तत्काल सक्रिय हो जाते हैं।
नीचे वे प्रमुख उदाहरण हैं जिन्हें राकेश किशोर ने अपने वक्तव्य में प्रस्तुत किया:
1. “मूर्ति से ध्यान लगाओ” वाला उपहास
किशोर ने 16 सितम्बर को हुए एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई का उदाहरण दिया। इस याचिका में खजुराहो मंदिर की एक प्राचीन मूर्ति के संरक्षण से संबंधित विषय उठाया गया था। किशोर का आरोप है कि पीठ ने इस विषय को हल्के में लेते हुए याचिकाकर्ता से कहा — “मूर्ति से प्रार्थना करो, वही स्वयं को ठीक कर लेगी।”
उन्होंने कहा — “जब हमारे सनातन धर्म से जुड़ा कोई विषय आता है, तो न्यायालय किसी न किसी प्रकार का ऐसा आदेश अवश्य पारित कर देता है जो हमारे विश्वास को उपहास का रूप दे देता है।”
किशोर और उनके जैसे अनेक नागरिकों के लिए यह केवल एक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि एक लगातार दिखाई देने वाले पैटर्न का प्रतीक थी — जहाँ हिन्दू धार्मिक भावनाओं को तिरस्कार के स्वर में देखा जाता है, जबकि अन्य धार्मिक विषयों पर न्यायपालिका अत्यधिक सावधानी और सम्मान दिखाती है।
2. हल्द्वानी रेलवे भूमि मामला
किशोर ने दूसरा उदाहरण हल्द्वानी मामला बताया। जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के उस आदेश पर स्थगन दिया था जिसमें 29 एकड़ रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था — “50,000 लोगों को एक रात में नहीं हटाया जा सकता,” और इसे “मानवीय विषय” बताया। यह स्थगन आदेश लगातार बढ़ाया गया और अन्ततः सितम्बर 2024 में पुनर्वास योजना हेतु दो माह का समय और दिया गया।
किशोर ने इस निर्णय की तुलना मंदिर-संबंधी प्रकरणों से की, जहाँ वर्षों तक सुनवाई नहीं होती। उन्होंने प्रश्न उठाया — “सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों के लिए तो न्यायालय करुणा दिखाता है, परन्तु जिन नागरिकों का उद्देश्य केवल प्राचीन मंदिरों की रक्षा है, उनके लिए यह करुणा कहाँ चली जाती है?”
यह “चयनात्मक करुणा” और “चयनात्मक त्वरिता” का उदाहरण है — जहाँ कुछ मामलों में त्वरित स्थगन आदेश मिलते हैं, और कुछ में पीढ़ियाँ बीत जाती हैं।
3. नूपुर शर्मा प्रकरण
किशोर ने अपने वक्तव्य में सबसे अधिक तीव्रता से नूपुर शर्मा मामले का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उस सुनवाई में नूपुर शर्मा को “देश में असंतोष फैलाने के लिए अकेली जिम्मेदार” बताया और कहा कि “उनकी जुबान ने देश में आग लगा दी।”
किशोर के अनुसार, न्यायालय ने यहाँ तक कह दिया कि उदयपुर की हत्या की घटना के लिए भी वह अप्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी हैं। यह स्थिति इस बात को दर्शाती है कि यदि कोई व्यक्ति हिन्दू पहचान के साथ अपनी बात रखता है, तो उसके कथन को “शांति भंग” के रूप में देखा जाता है; परन्तु यदि वही बात किसी अन्य समुदाय से आती, तो उसे “भावनात्मक प्रतिक्रिया” कहकर छोड़ दिया जाता।
यह वह क्षण था जहाँ अदालत ने “शांति बनाए रखने” को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से ऊपर रख दिया — और वह भी केवल तब जब वक्ता हिन्दू था।
4. हिन्दू उत्सवों में न्यायिक हस्तक्षेप
किशोर ने चौथा उदाहरण दिया — धार्मिक पर्वों और परंपराओं में न्यायिक हस्तक्षेप का। उन्होंने कहा कि “दही हांडी की ऊँचाई” और “जलेबी टॉवर की सीमा” जैसे विषयों पर न्यायालय का अत्यधिक नियंत्रण दिखाता है कि किस प्रकार हिन्दू परंपराओं को प्रशासनिक निरीक्षण के अधीन कर दिया गया है।
2016 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि दही हांडी का पिरामिड 20 फीट से अधिक ऊँचा न बनाया जाए और 18 वर्ष से कम आयु के युवाओं की भागीदारी वर्जित हो।
इस प्रकार की सूक्ष्म नियंत्रक नीतियाँ अन्य किसी धर्म या समुदाय के पर्वों पर लागू नहीं की जातीं। किशोर के अनुसार, यह हिन्दू परंपराओं के प्रति अविश्वास और नियंत्रण भावना का उदाहरण है।
अन्य आलोचनाएँ — समान पैटर्न का विस्तार
कई विश्लेषकों और कानूनी पर्यवेक्षकों का मानना है कि राकेश किशोर द्वारा उठाई गई शिकायतें केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं हैं। पिछले एक दशक में अनेक न्यायिक घटनाएँ इस धारणा को पुष्ट करती हैं कि न्यायालय धार्मिक और राजनीतिक विषयों में समान मानदंड नहीं अपनाते।
जब मामला हिन्दू धर्म या राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से जुड़ा होता है, तब न्यायालय और आयोग कठोरता या तिरस्कार दिखाते हैं;
जब वही मुद्दा किसी अन्य समुदाय या विचारधारा से संबंधित होता है, तब न्यायालय संयम, संवेदना या मौन धारण कर लेते हैं।
उदाहरण
(1) असमान जमानत मानदंड:
प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तियों को राहत शीघ्र मिल जाती है, जबकि धार्मिक या सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा करने वाले कार्यकर्ताओं को महीनों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
(2) न्याय में विलंब:
अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35A से संबंधित याचिकाएँ वर्षों तक लंबित रहीं, जबकि अन्य समुदायों की शिकायतों पर शीघ्र सुनवाई हुई।
(3) सांस्कृतिक मामलों में नियंत्रण प्रवृत्ति:
कई निर्णयों में न्यायालय ने हिन्दू सुधार आंदोलनों की भावना को अंधविश्वास या अज्ञान की दृष्टि से देखा और उन्हें राज्य पर्यवेक्षण की आवश्यकता बताई।
(4) हिंसा और दंगों की कथाएँ:
कई मामलों में न्यायिक और मीडिया विश्लेषण ने तथ्यों से पहले ही हिन्दू पक्ष को दोषी ठहराने का रुझान दिखाया।
(5) धार्मिक आयोजनों पर असमान नियमन:
कांवड़ यात्रा, कुंभ मेला या अन्य तीर्थ-यात्राओं को “स्वास्थ्य या सुरक्षा खतरे” के नाम पर नियंत्रित किया गया, जबकि अन्य धार्मिक आयोजनों पर ऐसा हस्तक्षेप नहीं हुआ।
(6) ऐतिहासिक अत्याचारों पर मौन:
असम के खोइराबाड़ी नरसंहार और बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुए हमलों जैसे विषयों पर न्यायिक सक्रियता न्यूनतम रही।
इन सभी उदाहरणों को जोड़ने पर एक व्यापक तस्वीर बनती है — संस्थागत असमानता और चयनात्मक संवेदनशीलता की।
इसी पृष्ठभूमि में राकेश किशोर की घटना को देखा जाना चाहिए — यह कोई आकस्मिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि न्यायिक दोहरे मानदंडों से उत्पन्न गहरी राष्ट्रीय थकान का प्रतीक है।
न्यायिक पारदर्शिता और सीमित उत्तरदायित्व
कई कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायपालिका की पारदर्शिता भी चयनात्मक है।
इसका उदाहरण है राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को निरस्त करने का निर्णय — जहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने बिना किसी वैकल्पिक ढाँचे के इसे रद्द कर दिया।
इसके अतिरिक्त, 2024 में इलेक्टोरल बॉण्ड योजना को पारदर्शिता के नाम पर असंवैधानिक घोषित किया गया और सभी दाताओं व लाभार्थियों के नाम सार्वजनिक करने का आदेश दिया गया,
परंतु न्यायपालिका ने अपने नियुक्ति, विचार-विमर्श और उत्तरदायित्व के क्षेत्र में वही पारदर्शिता लागू नहीं की।
कोलेजियम प्रणाली अब भी एक अंतःसंस्थागत गोपनीय प्रक्रिया है —
संसद की समीक्षा से बाहर, सूचना के अधिकार से अप्रभावित, और किसी बाहरी लेखा परीक्षण से मुक्त।
फाइलें बंद कमरों में आगे बढ़ती हैं, असहमति के नोट सार्वजनिक नहीं किए जाते, और संभावित हित-संघर्षों के प्रश्न भी आंतरिक स्तर पर ही सुलझाए जाते हैं।
यह विरोधाभास गहरा है — वही संस्था जो दूसरों से पूर्ण पारदर्शिता की अपेक्षा करती है, स्वयं को उसी सिद्धांत से मुक्त रखती है।
इसके अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय का लंबे अवकाशों में बंद रहना भी आलोचना का विषय रहा है।
देश के संवैधानिक मामलों की सुनवाई लंबित रहते हुए भी कई सप्ताह तक अदालतें अवकाश पर चली जाती हैं।
बहुतों के अनुसार, यह परंपरा औपनिवेशिक काल की विरासत है — जहाँ न्यायिक संस्था राज्य या शासक के प्रति उत्तरदायी न होकर, अपने विशेषाधिकारों की रक्षक बन जाती थी।
निष्कर्ष
इन सब विरोधाभासों का परिणाम यह हुआ है कि जनता का विश्वास न्यायपालिका की समानता और निष्पक्षता पर कमज़ोर होता जा रहा है।
जब पारदर्शिता केवल दूसरों पर लागू हो और न्याय का तराजू पहचान के आधार पर झुके, तो यह केवल एक प्रशासनिक संकट नहीं, बल्कि एक नैतिक संकट बन जाता है।
अधिवक्ता राकेश किशोर जैसे लोग इसी असंतुलन के प्रति अपनी पीड़ा व्यक्त कर रहे हैं — कि न्याय केवल दिया ही न जाए, बल्कि समान रूप से दिया गया दिखाई भी दे।
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